लोकतंत्र का एक शाश्वत नियम है – जब आप काम न करें, तो जनता नाराज होती है। लेकिन भारतीय राजनीति का नया और आधुनिक नियम यह है कि जब जनता आपसे नाराज हो, तो विपक्ष को खुद ही मैदान छोड़कर भाग जाना चाहिए ताकि आपको चैन की सांस लेने की जगह मिल सके। हालिया राजनीतिक विश्लेषणों ने इसी महान सत्य को उजागर किया है कि भले ही भाजपा की लोकप्रियता का ग्राफ थोड़ा ढलान पर हो, लेकिन विपक्ष का ‘आत्मसमर्पण’ और उसका ‘विनाश’ ही भाजपा के लिए असली संजीवनी बूटी बन गया है।
जब जनता रूठे, तो विपक्ष बचाए
वाह! क्या अद्भुत क्रोनोलॉजी है। एक तरफ महंगाई, बेरोजगारी और प्रशासनिक विफलताओं के कारण जनता के माथे पर बल पड़ रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ हमारे मुख्य विपक्षी दल ‘अस्तित्व के संकट’ की गहरी और सुखद नींद में सोए हुए हैं। भाजपा के लिए इससे बड़ी ईश्वरीय कृपा और क्या हो सकती है? जब-जब सरकार की नीतियों से त्रस्त होकर जनता किसी विकल्प की तलाश में आंखें घुमाती है, तब-तब विपक्ष का कोई न कोई बड़ा नेता खुद ही आत्मघाती कदम उठा लेता है। या फिर, केंद्रीय एजेंसियों की ‘परम कृपा’ से वे या तो जेल की सलाखों के पीछे होते हैं या फिर वाशिंग मशीन में धुलकर सीधे सत्तारूढ़ दल के मंच पर माला पहने दिखाई देते हैं।
विपक्ष का ‘कबाड़खाना’ और सत्ता की ‘ऑक्सीजन’
विपक्ष की इस ‘स्व-विनाशकारी’ कला की जितनी भी तारीफ की जाए, वह कम ही होगी। जनता बदलाव तो चाहती है, लेकिन विकल्प के नाम पर उसे क्या मिलता है? एक ऐसा बिखरा हुआ कुनबा, जो चुनाव से ठीक पहले आपस में ही सीट-शेयरिंग के नाम पर सिर-फुटौव्वल शुरू कर देता है। ‘काक-वाणी’ का मानना है कि भाजपा को अपने तमाम विरोधियों को विशेष ‘साधुवाद पत्र’ भेजना चाहिए। आखिर उन्हीं की बदौलत तो सरकार को वह कीमती ‘ब्रीदिंग स्पेस’ (सांस लेने की जगह) मिलती है, जिसके बिना सत्ता की गाड़ी कब की हांफने लगी होती। जब विपक्ष खुद ही खुद को तबाह करने पर आमादा हो, तो भला सत्ता पक्ष को जनता के प्रति जवाबदेह होने की क्या जरूरत?
जब कोई न हो टक्कर में, तो काहे का डर!
संक्षेप में कहें तो, लोकतंत्र का यह नया मॉडल बेहद किफायती है। यहां सरकार को अपनी लोकप्रियता बचाने के लिए अपना प्रदर्शन सुधारने की जरूरत नहीं है; बस विपक्ष को थोड़ा और कमजोर, दिशाहीन और नेतृत्वविहीन बनाए रखना ही काफी है। जब तक विपक्ष खुद को नष्ट करने के नए-नए और रचनात्मक तरीके खोजता रहेगा, तब तक भाजपा की नाव बिना पतवार के भी मजे से लहरों पर तैरती रहेगी। इसे कहते हैं – ‘एक तो हमारी नाकामी, ऊपर से तुम्हारी नासमझी का सहारा’। भारतीय लोकतंत्र अमर रहे, और ऐसा परोपकारी विपक्ष तो अनंत काल तक अमर रहे!
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