बहुत समय पहले की बात है, एक समृद्ध नगर में देवदत्त नाम का एक अत्यंत धनी व्यापारी रहता था। उसने अपने पूरे जीवन में केवल धन कमाने को ही अपना एकमात्र धर्म माना था। उसके पास आलीशान महल, दर्जनों नौकर-चाकर और सोने-चांदी के बड़े-बड़े अंबार थे। लेकिन धन की इस अंधी दौड़ में वह अपने परिवार, मित्रों और खुद के जीवन की खुशियों को जीना ही भूल गया। धीरे-धीरे समय बीतता गया और बुढ़ापे में देवदत्त एक गंभीर बीमारी से ग्रस्त हो गया। राजवैद्य ने कह दिया कि अब उसके पास जीवित रहने के लिए कुछ ही दिनों का समय शेष है।
एक अमीर व्यक्ति की अंतिम इच्छा
अपनी मृत्यु को अत्यंत निकट देखकर देवदत्त बुरी तरह भयभीत हो गया। उसे अपनी सारी धन-दौलत, जिसे उसने रात-दिन एक करके कमाया था, एकदम निरर्थक लगने लगी। वह एकांत में बैठकर सोचने लगा कि क्या वह अपनी इस अपार संपत्ति में से कुछ भी अपने साथ परलोक नहीं ले जा सकता? उसी समय उस नगर में एक परम ज्ञानी साधु का आगमन हुआ। देवदत्त ने साधु को अपने महल में आमंत्रित किया और रोते हुए उनके चरणों में गिर पड़ा। उसने कहा, “हे महात्मा! मैंने जीवनभर बहुत कष्ट सहकर यह संपत्ति जोड़ी है। क्या ऐसा कोई उपाय नहीं है कि मैं अपनी मौत के बाद कम से कम एक सोने का सिक्का अपने साथ परलोक ले जा सकूं?”
साधु की अनोखी शर्त
साधु देवदत्त की अज्ञानता और लाचारी को देखकर मंद-मंद मुस्कुराए। उन्होंने अत्यंत शांत स्वर में कहा, “देवदत्त, यह बिल्कुल संभव है। तुम परलोक में अपने साथ सोने का सिक्का ले जा सकते हो, लेकिन इसके लिए तुम्हें मेरी एक शर्त पूरी करनी होगी। तुम्हें इस पूरे नगर में किसी ऐसे व्यक्ति को ढूंढना होगा, जो अपनी जिंदगी से पूरी तरह से संतुष्ट हो और तुम्हें बिना किसी लालच के, निस्वार्थ भाव से अपनी एक सच्ची मुस्कान उपहार में दे सके।”
देवदत्त को लगा कि यह तो बेहद आसान काम है। वह तुरंत अपने सेवकों के साथ नगर की ओर निकल पड़ा। उसने कई बड़े-बड़े राजाओं, जमींदारों और अमीर व्यापारियों से मुलाकात की। उसने उन्हें कीमती उपहारों का लालच दिया ताकि बदले में वे उसे अपनी संतुष्टि भरी मुस्कान दे सकें। लेकिन जो भी मुस्कुराता, उसकी मुस्कान के पीछे और अधिक धन पाने का लोभ साफ झलकता था। कोई भी भीतर से संतुष्ट नहीं था। देवदत्त निराश होने लगा, क्योंकि उसका समय तेजी से समाप्त हो रहा था और शरीर शिथिल पड़ता जा रहा था।
निस्वार्थ प्रेम का असली रूप
थक-हारकर देवदत्त नगर के बाहर एक अत्यंत टूटी-फूटी झोपड़ी के पास से गुजरा। वहां उसने देखा कि एक गरीब मां अपने भूखे बच्चे को सूखी रोटी का आखिरी टुकड़ा खिला रही थी। खुद पूरे दिन से भूखी होने के बावजूद, अपने बच्चे का पेट भरता देख उस मां के चेहरे पर एक अलौकिक, निस्वार्थ और गहरी संतुष्टि से भरी मुस्कान बिखरी हुई थी।
देवदत्त तुरंत झोपड़ी के भीतर गया और उस महिला के सामने सोने की अशर्फियां रखकर रोते हुए बोला, “हे देवी! मैं तुम्हें अपनी आधी संपत्ति देने को तैयार हूं, बस मुझे अपनी यह सच्ची और संतुष्ट मुस्कान दे दो ताकि मैं परलोक में अपना सोने का सिक्का ले जा सकूं।”
महिला ने आदरपूर्वक मुस्कुराते हुए सोने के सिक्कों को एक तरफ हटा दिया और कहा, “सेठ जी, यह मुस्कान बिकाऊ नहीं है। यह मेरे बच्चे के प्रति मेरे निस्वार्थ प्रेम और ईश्वर के प्रति संतोष से जन्मी है, जिसे संसार का सारा धन मिलकर भी नहीं खरीद सकता।”
यह सुनते ही देवदत्त के भीतर जैसे ज्ञान का प्रकाश फैल गया और उसकी आंखें बह निकलीं। उसे समझ आ गया कि जीवन का असली सत्य क्या है। वह खाली हाथ आया था और खाली हाथ ही जाएगा। केवल निस्वार्थ प्रेम, संतोष और अच्छे कर्म ही आत्मा के सच्चे धन हैं। देवदत्त ने अपनी सारी संपत्ति गरीबों और अनाथों में बांट दी और जीवन के अंतिम क्षणों में परम शांति का अनुभव करते हुए अपने प्राण त्याग दिए।
कहानी से सीख (Moral)
सीख: इस लोककथा से हमें यह सीख मिलती है कि जीवन का सबसे बड़ा सच यही है कि भौतिक वस्तुएं और धन-दौलत यहीं मिट्टी में मिल जाते हैं। मनुष्य इस संसार से विदा होते समय अपने साथ केवल अपने सत्कर्म, दूसरों के प्रति निस्वार्थ प्रेम और दूसरों के चेहरे पर लाई गई सच्ची मुस्कान ही ले जा सकता है। संतोष ही मनुष्य का सबसे अनमोल और वास्तविक धन है।</p