सिद्धार्थ ने ‘हाइपर-मैस्कुलिनिटी’ पर तोड़ी चुप्पी: बताया आखिर क्या है उनके लिए ‘असली मर्दानगी’!

काक-वाणी के चटपटे गलियारे में आप सभी का स्वागत है! दोस्तों, क्या आपने भी गौर किया है कि आजकल की फिल्मों में हीरो सिर्फ दहाड़ते, गाड़ियां उड़ाते और बिना बात के गुस्सा दिखाते नजर आते हैं? जी हां, इसे ही सिनेमाई भाषा में ‘हाइपर-मैस्कुलिनिटी’ यानी अति-मर्दानगी कहा जा रहा है। इस बढ़ते हुए ट्रेंड पर अब हमारे चहेते और संजीदा एक्टर Siddharth ने अपनी चुप्पी तोड़ी है। अपनी बेहतरीन एक्टिंग से लोगों के दिलों पर राज करने वाले सिद्धार्थ जल्द ही देश के एक ऐतिहासिक मिशन पर आधारित फिल्म ‘Operation Safed Sagar’ में नजर आने वाले हैं। हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने सिनेमा के इस ‘अंगार उगलते’ अल्फा-मेल वाले अंदाज पर अपना करारा रिएक्शन दिया है।

सिनेमा में ‘अल्फा मेल’ का शोर और सिद्धार्थ का बेबाक अंदाज

आजकल बॉक्स ऑफिस पर ऐसी फिल्मों का बोलबाला है जहां हीरो का हिंसक और आक्रामक होना ही उसकी सबसे बड़ी खूबी मान लिया गया है। लेकिन सिद्धार्थ इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि मेरी नजर में ‘मर्दानगी’ की परिभाषा बहुत अलग है। सिद्धार्थ के अनुसार, “किसी को नीचा दिखाना, औरतों पर अपना हुक्म चलाना या बेवजह की हिंसा करना असली मर्दानगी नहीं है। असली मर्द वो है जो संवेदनशील हो, जो दूसरों का आदर करना जानता हो और जिसमें अपनी कमजोरियों को स्वीकार करने की हिम्मत हो।”

सिद्धार्थ का यह बयान उन सभी निर्देशकों और लेखकों के लिए एक आईना है जो केवल मार-धाड़ और चिल्लाने वाले किरदारों को ही असली ‘हीरो’ बनाकर पेश कर रहे हैं। सिद्धार्थ ने युवाओं को भी यह संदेश दिया कि पर्दे पर दिखाई जाने वाली इस नकली मर्दानगी से प्रभावित होने की जरूरत नहीं है।

‘ऑपरेशन सफेद सागर’ में दिखेगा वीरता का असली रूप

सिद्धार्थ बहुत जल्द फिल्म ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ में एक बेहद महत्वपूर्ण भूमिका में नजर आएंगे। यह फिल्म 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय वायुसेना द्वारा चलाए गए ऐतिहासिक हवाई हमले पर आधारित है। सिद्धार्थ का मानना है कि जो सैनिक और देश के रक्षक असल जिंदगी में सरहद पर लड़ते हैं, वे कभी भी इस तरह का फालतू ड्रामा या दिखावा नहीं करते। उनकी वीरता में एक ठहराव, अनुशासन और गरिमा होती है। यही सच्ची मर्दानगी है और यही वो पर्दे पर भी दिखाना चाहते हैं।

सिद्धार्थ के इस बयान ने सोशल मीडिया पर एक नई बहस छेड़ दी है। जहां एक तरफ लोग उनके इस विचार की जमकर तारीफ कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ एक्शन लवर्स के बीच इस पर तीखी चर्चा शुरू हो गई है।

तो दोस्तों, सिद्धार्थ की इस सोच पर आपका क्या कहना है? क्या वाकई सिनेमा में अब संजीदा और संवेदनशील पुरुषों की कहानियां दिखाई जानी चाहिए? अपनी राय हमें जरूर बताएं और काक-वाणी के साथ जुड़े रहें!


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कागा जी