भारत में लोकतंत्र एक ऐसा उत्सव है जहां हर पांच साल में एक नई फिल्म रिलीज होती है। लेकिन इस बार तमिलनाडु से खबर आई है कि वहां सचमुच की एक ‘ब्लॉकबस्टर’ रिलीज होने वाली है। द न्यू इंडियन एक्सप्रेस ने घोषणा की है कि तमिल अभिनेता विजय का राजनीतिक मॉडल भारत की राजनीति में एक ‘बड़ा राजनीतिक व्यवधान’ (Disruption) पैदा कर सकता है। जी हां, क्योंकि जब तक देश की राजनीति में स्लो-मोशन एंट्री, बैकग्राउंड म्यूजिक और हवा में उड़ते हुए विलेन न हों, तब तक भारतीय मतदाताओं को असली लोकतंत्र का अहसास ही कहां होता है!
सिनेमाई चश्मे से लोकतंत्र का नया चश्मा
तमिलनाडु का इतिहास गवाह है कि वहां मुख्यमंत्री की कुर्सी का रास्ता सीधे फिल्म स्टूडियो से होकर गुजरता है। एमजीआर से लेकर जयललिता तक, सबने पहले जनता का मनोरंजन किया और फिर सत्ता में आकर भी वही सिलसिला जारी रखा। अब इस कतार में हमारे ‘थलापति’ विजय भी अपनी नई पार्टी ‘तमिलगा वेत्री कड़गम’ (TVK) के साथ खड़े हैं। बुद्धिजीवियों का मानना है कि विजय का मॉडल अद्भुत है। इस मॉडल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें जटिल नीतिगत बहसों की कोई जरूरत नहीं होती। बस एक अच्छा कोरियोग्राफर, दमदार डायलॉग और जनता के सामने कॉलर खड़ा करने की कला होनी चाहिए। पारंपरिक राजनेता सालों तक धूप में पसीना बहाकर थक जाते हैं, और यहाँ हमारे नायक केवल ढाई घंटे की फिल्म में गरीबी मिटाकर सीधे जननायक बन जाते हैं।
विकास का ‘वन-मैन शो’ मॉडल
इस ‘विजय मॉडल’ को भारत के भविष्य के रूप में देखना बेहद रोमांचक है। सोचिए, अगर यह मॉडल पूरे देश में लागू हो गया तो संसद की कार्यवाही कितनी मनोरंजक हो जाएगी! फिर किसी विधेयक पर बहस के दौरान सांसदों को चिल्लाने की जरूरत नहीं होगी, वे सीधे एक-दूसरे पर सुपर-किक चलाएंगे। विपक्षी दलों के सवालों का जवाब देने के लिए प्रधानमंत्री को केवल एक शानदार पंच-लाइन बोलनी होगी और पूरा सदन तालियों से गूंज उठेगा। काक-वाणी का मानना है कि इस मॉडल में सबसे ज्यादा फायदा चुनाव आयोग का होगा, जिसे रैलियों के लिए मैदान बुक करने की जरूरत नहीं पड़ेगी; बस किसी बड़े मल्टीप्लेक्स में ‘फर्स्ट डे, फर्स्ट शो’ की टिकटें बांट दी जाएं, चुनावी प्रचार अपने आप सफल हो जाएगा।
काक-वाणी: आखिर में जनता ही ‘एक्स्ट्रा’ है
लेकिन इस ‘पॉलिटिकल डिस्रप्शन’ की एक कड़वी हकीकत भी है। सिनेमा के पर्दे पर जो नायक बिना झुर्रियों के सौ दुश्मनों को धूल चटा देता है, असली राजनीति के मैदान में उसे बिजली, पानी और सड़क के बुनियादी सवालों के सामने पसीना आ जाता है। राजनीति में कोई ‘रीटेक’ नहीं होता और न ही कोई ‘बॉडी-डबल’ जनता की गालियां खाने के लिए उपलब्ध रहता है। थियेटर की जनता तालियां बजाकर घर लौट जाती है, लेकिन हकीकत की जनता पांच साल तक मुफ्त की रेवड़ियों के इंतजार में लाइन में खड़ी रहती है। अब देखना यह है कि थलापति विजय का यह नया शो बॉक्स ऑफिस पर हिट रहता है या फिर पहले ही हफ्ते में दर्शक ‘नो-शो’ का बोर्ड टांग देते हैं। तब तक के लिए, सीट बेल्ट बांधिए और इस राजनीतिक सिनेमा का आनंद लीजिए!
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