दिल चाहता है से जवान तक: 25 सालों में बॉलीवुड ने क्या खोया और क्या पाया?

साल 2001 याद है? जब ‘दिल चाहता है’ के समीर, सिड और आकाश के साथ हम सब गोवा जाने के सपने देख रहे थे, और ‘लगान’ के भुवन के साथ मिलकर हमने अंग्रेजों को धूल चटाई थी। अब सीधे टाइम ट्रेवल करके साल 2026 में आ जाइए। आज हमारे पास 1000 करोड़ के क्लब हैं, वीएफएक्स (VFX) की भरमार है और ‘पैन-इंडिया’ फिल्मों का शोर है। लेकिन इस चकाचौंध के बीच क्या आपने ध्यान दिया कि हमारे प्यारे बॉलीवुड ने पिछले 25 सालों में कुछ बहुत कीमती खो दिया है? द इंडियन एक्सप्रेस की हालिया रिपोर्ट ‘द ग्रेट बॉलीवुड डिवाइड’ इसी कड़वे सच से पर्दा उठाती है, और आज ‘काक-वाणी’ पर हम इसका मजेदार एक्सरे करने वाले हैं।

क्या खो गई फिल्मों की रूह और सादगी?

2001 से 2026 के सफर में जो सबसे बड़ा बदलाव आया है, वो है फिल्मों से ‘मासूमियत’ का गायब होना। पहले फिल्में दिल से बनती थीं, अब वे एक्सेल शीट और एल्गोरिदम से तय होती हैं। Bollywood Movies आज दर्शकों की भावनाएं समझने के बजाय इस बात पर फोकस करती हैं कि सोशल मीडिया पर कौन सा रील ट्रेंड चल रहा है। आज हमारे पास बड़े बजट की एक्शन पैक्ड फिल्में तो हैं, लेकिन ‘वीर-जारा’ या ‘स्वदेश’ जैसा सुकून देने वाला संगीत और सादगी अब ढूंढने से भी नहीं मिलती।

मल्टीप्लेक्स बनाम सिंगल स्क्रीन की बड़ी खाई

इस ढाई दशक में बॉलीवुड दो हिस्सों में बुरी तरह बंट गया है। एक तरफ वो ‘क्लासी’ सिनेमा है जो सिर्फ मेट्रो शहरों के मल्टिप्लेक्सों और कोरपोरेट ऑडियंस के लिए बनता है, और दूसरी तरफ वो साउथ से प्रेरित ‘लार्जर दैन लाइफ’ एक्शन फिल्में हैं जो सिंगल स्क्रीन्स पर सीटी बजवाती हैं। इस ‘ग्रेट डिवाइड’ के चक्कर में वो प्यारी मिड-बजट फिल्में कहीं गुम हो गईं जो पूरे परिवार को एक साथ थिएटर तक खींच लाती थीं। आज या तो फिल्म 500 करोड़ की होती है या फिर सीधे ओटीटी (OTT) के किसी कोने में डंप हो जाती है।

मिस्ट्री खत्म, रील का ड्रामा चालू!

साल 2001 में सुपरस्टार्स के दीदार के लिए फैंस तरसते थे और उनकी एक झलक के लिए सिनेमाघरों में मेला लगता था। लेकिन आज 2026 में, स्टार्स हर वक्त आपके मोबाइल स्क्रीन पर जिम लुक, एयरपोर्ट लुक और पैपराजी के कैमरों के सामने हाथ हिलाते दिख जाते हैं। स्टारडम की वो ‘रहस्यमयी’ चमक अब खत्म हो चुकी है। जब एक्टर्स दिन में दस बार सोशल मीडिया पर दिखेंगे, तो दर्शक थिएटर में टिकट खरीदकर उन्हें देखने क्यों जाएंगे?

काक-वाणी का सीधा सवाल यही है- क्या भारी-भरकम वीएफएक्स और करोड़ों के कलेक्शन के चक्कर में हिंदी सिनेमा ने अपनी असली ताकत यानी ‘सच्ची कहानी’ को खो दिया है? आपको क्या लगता है, क्या बॉलीवुड अपना पुराना चार्म वापस पा सकेगा?


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कागा जी