वाह! क्या जमाना आ गया है। हम ‘विश्वगुरु’ बनने की दहलीज पर खड़े हैं, चंद्रयान चांद पर सैर कर रहा है, और देश के कुछ नासमझ नागरिक अब भी चाय में चीनी की कीमत ढूंढ रहे हैं! ‘टेलीग्राफ इंडिया’ के संपादकीय ने भी इस कड़वे सच पर उंगली उठा दी है कि देश की राजनीति में ‘भौतिक मुद्दे’ यानी रोटी, कपड़ा और चीनी वापस लौट रहे हैं। सचमुच, यह हमारे अध्यात्म-प्रधान देश की छवि को बिगाड़ने की एक सोची-समझी साजिश है।
राष्ट्रवाद की चाशनी और कड़वी चीनी
जब से देश में डिजिटल क्रांति आई है, हमारे नागरिकों का पेट तो सोशल मीडिया के ज्ञान और राष्ट्रवाद की मीठी चाशनी से ही भर जाता था। लेकिन अचानक इस भाजपा (BJP) के स्वर्ण काल में चीनी के दाम क्या बढ़े, लोगों को अपनी कड़वी चाय का अहसास होने लगा। अरे भाई, जब आपको अमृत काल का ‘अमृत’ मुफ्त मिल रहा है, तो फिर चाय में चीनी की क्या जरूरत? लेकिन नहीं, जनता को तो हर चीज में मीन-मेख निकालने की आदत है। विपक्ष भी उछल रहा है, मानो महंगाई कोई मुद्दा हो। उन्हें समझना चाहिए कि जब तक देश सुरक्षित हाथों में है, तब तक बिना चीनी की चाय पीना भी एक महान देशभक्ति है।
भौतिक चिंताओं की यह ‘अवांछित’ वापसी
राजनीति के पंडित हैरान हैं कि चुनाव के ठीक पहले ये भौतिक चिंताएं—जैसे चीनी, प्याज और रसोई गैस—अचानक राजनीति के मंच पर क्यों आ धमकती हैं? क्या जनता के पास अब कोई बड़ा विज़न नहीं बचा? ‘काक-वाणी’ का मानना है कि यह जनता का पूरी तरह से गैर-जिम्मेदाराना रवैया है। जब सरकार दिन-रात आपको भव्य रैलियों और ऐतिहासिक फैसलों का मनोरंजन दे रही है, तो आपका ध्यान रसोई के बजट पर क्यों जाना चाहिए? भाजपा (BJP) की विकास यात्रा में इस तरह के छोटे-मोटे आर्थिक रोड़े अटकाना कतई न्यायसंगत नहीं है।
कड़वी सच्चाई और मीठे वादे
अंततः, इस कड़वाहट का इलाज केवल एक ही है—भाषणों की मिठास। अगर चीनी महंगी हो गई है, तो क्या हुआ? हमारे नेताओं के पास मीठे वादों का एक ऐसा भंडार है, जो कभी खत्म नहीं होता। वैसे भी, डॉक्टरों के मुताबिक ज्यादा मीठा खाना सेहत के लिए हानिकारक होता है; शायद सरकार इसी बहाने हमें मधुमेह से बचाना चाहती है। तो उठाइए बिना चीनी की कड़वी चाय का कप, और जोर से चिल्लाइए—’अहा! कितना मीठा है हमारा लोकतंत्र!’
संदर्भ मुख्य समाचार: यहाँ देखें