प्रिय देशवासियों, जागिए! क्योंकि अगर आप अब भी नहीं जागे, तो व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के ‘परम ज्ञानी’ आपको सोते-सोते ही चिकित्सा विज्ञान का नोबेल पुरस्कार दिलवा देंगे। हमारे विशेष खंड ‘काक-वाणी’ में आज हम बात कर रहे हैं सोशल मीडिया पर तैरने वाले उन वायरल दावों की, जिन्हें पढ़कर आइजैक न्यूटन की आत्मा भी स्वर्ग में सिर पकड़कर बैठी होगी।
नासा की आँखें गीली और यूनेस्को का सरेंडर
हर दूसरे दिन आपके पारिवारिक ग्रुप में एक संदेश तैरता है कि ‘नासा ने दिवाली के दिन भारत के नक्शे को अंतरिक्ष से देखा, सारे वैज्ञानिक रो पड़े!’। समझ नहीं आता कि नासा के वैज्ञानिक इतने भावुक क्यों हैं? क्या वहां स्पेस स्टेशन में टिशू पेपर का स्टॉक खत्म हो गया है? और हमारे प्रिय यूनेस्को बाबू! उन्होंने तो जैसे भारत की हर चीज को ‘विश्व का सर्वश्रेष्ठ’ घोषित करने का ठेका ले रखा है। कभी हमारा राष्ट्रगान दुनिया में नंबर वन घोषित हो जाता है, तो कभी दो रुपये का सिक्का। यूनेस्को के पेरिस मुख्यालय को खुद नहीं पता कि वे कब और कहाँ ये प्रमाण पत्र बांट रहे हैं, लेकिन हमारे मोहल्ले के शर्मा जी ने सुबह 5 बजे चाय की चुस्की के साथ इस ‘परम सत्य’ को 50 लोगों को फॉरवर्ड कर दिया है।
घरेलू नुस्खे: मौत को छूकर ‘टक्क’ से वापस आने की थेरेपी
व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के स्वघोषित डॉक्टरों के अनुसार, कैंसर और एड्स जैसी गंभीर बीमारियों का इलाज बेहद आसान है। बस आपको सुबह उठकर गर्म पानी में नींबू निचोड़ना है, और लीजिए, कीमोथेरेपी की छुट्टी! इन ‘व्हाट्सएप डॉक्टरों’ की मानें तो असली डॉक्टर तो बस लूटने के लिए बैठे हैं, असली इलाज तो इलायची और लौंग चबाने में है। एक और चमत्कारिक दावा अक्सर घूमता है – ‘इस संदेश को तुरंत 11 लोगों को भेजें, शाम तक कोई शुभ समाचार मिलेगा’। जिन लोगों ने इस अंधविश्वास को आगे नहीं बढ़ाया, उनके फोन का डेटा तो बच गया, लेकिन फॉरवर्ड करने वालों का मानसिक डेटा जरूर खतरे में है।
निष्कर्ष: फॉरवर्ड बटन दबाने से पहले थोड़ा सोचें
अंगूठे की फुर्ती और दिमाग की सुस्ती का यह बेजोड़ मेल हमारे समाज को अंधकार की ओर ले जा रहा है। फेक न्यूज के इस डिजिटल दलदल में सच कहीं खो गया है। इसलिए, अगली बार जब आपके पास ‘नासा की कसम’ या ‘वैज्ञानिकों का दावा’ वाला कोई चमत्कारी मैसेज आए, तो उसे आगे बढ़ाने के बजाय वहीं दम तोड़ने दें। याद रखिए, बिना जांचे-परखे किसी भी दावे को सच मानना समझदारी नहीं, बल्कि डिजिटल प्रदूषण फैलाना है। ‘काक-वाणी’ का सीधा संदेश है – ‘कौआ कान ले गया’ जैसी अफवाहों पर यकीन करने से पहले, एक बार अपने कान को हाथ लगाकर जरूर देख लें!