विज्ञान और तकनीक ने कितनी भी तरक्की कर ली हो, लेकिन हमारे देश के लिबरल बुद्धिजीवियों की “काल्पनिक टाइम ट्रैवल” तकनीक के सामने नासा और इसरो भी पानी भरते नजर आते हैं। हाल ही में ‘द वायर’ महाशय ने एक ऐसी दिव्य वैज्ञानिक रिसर्च पेश की है, जिसे पढ़कर न्यूटन और आइंस्टीन की आत्माएं भी अपना सिर पकड़ लेंगी। इस रिपोर्ट का परम ज्ञान यह है कि भारत आज नरेंद्र मोदी की वजह से गरीब और गुलाम है। अगर मोदी जी न होते, तो आज हर भारतीय के स्विस बैंक में तीन-चार खाते होते और हम सब आजादी की ऐसी ताजी हवा खा रहे होते कि हमारे फेफड़े भी धन्य हो जाते!
‘अगर-मगर’ की दुनिया और वायर की दिव्य दृष्टि
इस अद्भुत अध्ययन की सबसे बड़ी खूबसूरती इसकी ‘काल्पनिक कार्यप्रणाली’ है। यह रिसर्च इस सिद्धांत पर काम करती है कि “अगर नानी को मूंछें होतीं, तो वह दादाजी कहलातीं।” इस थ्योरी के हिसाब से, मोदी जी के बिना भारत आज इतना अमीर होता कि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन लोन के लिए भारतीय बैंकों के चक्कर काट रहे होते। हमारे यहां पेट्रोल पांच रुपये लीटर मिल रहा होता और गरीबी तो इतनी दूर भाग चुकी होती कि देश के गरीबों को म्यूजियम में संभालकर रखना पड़ता ताकि आने वाली पीढ़ी देख सके कि गरीब दिखते कैसे थे। लेकिन अफसोस, मोदी जी आ गए और उन्होंने हमारे इस स्वर्णिम भविष्य पर पानी फेर दिया।
आजादी का वह ‘गुमशुदा’ पैमाना
रिपोर्ट का दूसरा रोना हमारी ‘छिन चुकी आजादी’ पर है। लेखक महोदय का मानना है कि आज भारतीय नागरिक खुद को बेहद गुलाम महसूस कर रहा है। सच ही तो है! आज हालत यह है कि कोई भी आम नागरिक दिन-दहाड़े सोशल मीडिया पर बैठकर प्रधानमंत्री को तानाशाह और अनपढ़ नहीं बोल पाता। उसे ऐसा लिखने के लिए कितनी मानसिक प्रताड़ना से गुजरना पड़ता है, इसका अंदाजा केवल एयर-कंडीशनर वाले कमरों में बैठे बुद्धिजीवी ही लगा सकते हैं। पहले हम इतने आजाद थे कि भ्रष्टाचार करने की भी पूरी आजादी थी। अब तो हर चीज में आधार कार्ड और डिजिटल ट्रांजैक्शन घुसाकर सरकार ने हमारी टैक्स चोरी करने की मूलभूत स्वतंत्रता ही छीन ली है!
‘काक-वाणी’ का अंतिम निष्कर्ष
अंत में, ‘काक-वाणी’ इस महान काल्पनिक शोध के लिए ‘द वायर’ को पूरे दस में से दस नंबर देती है। हमारी सलाह है कि इस रिसर्च टीम को तुरंत ‘नोबेल शांति और काल्पनिक अर्थशास्त्र’ का संयुक्त पुरस्कार दिया जाना चाहिए। जब तक हमारे पास ऐसे जादुई पत्रकार मौजूद हैं, तब तक हमें अमीर होने के लिए सचमुच मेहनत करने की कोई जरूरत नहीं है। हम बस ‘क्या होता अगर…’ की ख्याली पुलाव वाली दुनिया में ही महाशक्ति बने रहेंगे।
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