न्याय की पुकार और ठिठुरती रात
सर्दियों की एक ऐसी बर्फीली रात थी जब हवाएं भी जिस्म को चीरती हुई महसूस हो रही थीं। मुगल सम्राट अकबर ने अपनी प्रजा की सहनशक्ति की परीक्षा लेने के लिए एक क्रूर घोषणा करवाई। घोषणा यह थी कि जो कोई भी पूरी रात महल के पीछे बहने वाले ठंडे तालाब के पानी में खड़ा रहेगा, उसे सौ सोने की मोहरें इनाम में दी जाएंगी।
उसी नगर में माधव नाम का एक अत्यंत गरीब बुनकर रहता था। उसकी सात साल की बेटी गंभीर रूप से बीमार थी और उसके पास इलाज के लिए एक दमड़ी भी नहीं थी। अपनी बेटी की जिंदगी बचाने की तड़प में, माधव ने इस जानलेवा चुनौती को स्वीकार कर लिया। वह पूरी रात उस हाड़ कंपा देने वाले पानी में खड़ा रहा। वह अपनी बेटी के मासूम चेहरे को याद करता रहा और भगवान से उसकी सलामती की भीख मांगता रहा।
सुबह जब कांपता हुआ माधव दरबार में हाजिर हुआ, तो अकबर ने आश्चर्य से पूछा, “तुमने इस भयंकर ठंड में पूरी रात मौत को कैसे मात दी?”
माधव ने रुंधे गले से उत्तर दिया, “जहाँपनाह, दूर महल की छत पर जल रहा एक नन्हा दीया मुझे दिख रहा था। मैंने अपनी नज़रें उस दीये पर टिकाए रखीं और अपनी बेटी के जीवन की उम्मीद में रात काट ली।”
अकबर के दरबारी ईर्ष्यालु थे। उन्होंने अकबर के कान भरे, “जहाँपनाह! इसका मतलब इसने उस दीये की गर्मी से खुद को बचाया। यह धोखा है!” अकबर ने भी अपनी संवेदनशीलता खो दी और माधव को बिना इनाम के दरबार से बाहर निकाल दिया। माधव के आंसू उसकी लाचारी की गवाही दे रहे थे।
बीरबल का मौन विरोध
बीरबल दरबार में ही उपस्थित थे। माधव के आंसुओं ने उनके दिल को झकझोर कर रख दिया था। उन्होंने ठान लिया कि वे इस बेबस पिता को न्याय दिलाकर ही दम लेंगे। अगले दिन बीरबल दरबार में नहीं आए। जब अकबर ने सैनिक भेजे, तो बीरबल ने संदेश भिजवाया कि वे अपनी खिचड़ी पका रहे हैं, जैसे ही पक जाएगी, वे हाजिर हो जाएंगे।
जब दोपहर से ढलती शाम हो गई और बीरबल नहीं आए, तो चिंतित होकर सम्राट अकबर खुद उनके घर पहुंचे। वहाँ का दृश्य देखकर अकबर दंग रह गए। ज़मीन पर सूखी लकड़ियां जल रही थीं और उससे करीब दस फीट की ऊंचाई पर एक बांस के सहारे हांडी लटकी हुई थी।
अहसास की आंच और न्याय
अकबर जोर से हँसे और बोले, “बीरबल! क्या तुम्हारा दिमाग ठिकाने नहीं है? इतनी ऊंचाई पर रखी हांडी को इस ज़मीन पर जलती आग की गर्मी कैसे मिलेगी? यह खिचड़ी कभी नहीं पकेगी।”
बीरबल ने अपनी नम आँखों से अकबर की ओर देखा और बहुत ही शांत लेकिन गंभीर आवाज में कहा, “जहाँपनाह! अगर महल की छत पर जलने वाले एक अदने से दीये की गर्मी, तालाब के बर्फीले पानी में खड़े एक गरीब माधव को बचा सकती है, तो इस सुलगती आग की आंच इस हांडी तक क्यों नहीं पहुंच सकती?”
बीरबल की बात सीधे अकबर के दिल पर लगी। उनके भीतर के राजा का अहंकार टूट गया और उन्हें अपनी भयानक भूल का अहसास हुआ। उनकी आँखों में ग्लानि के आंसू थे। उन्होंने तुरंत माधव को ससम्मान दरबार में बुलाया, उसे सौ के बदले पांच सौ सोने की मोहरें दीं और उसकी बेटी के शाही इलाज का प्रबंध भी कराया।
सीख: सत्ता और अधिकार के नशे में इंसान को कभी भी अपनी संवेदनशीलता और न्याय की समझ को नहीं खोना चाहिए। किसी की लाचारी का मजाक उड़ाना सबसे बड़ा पाप है।