एक बेबस पिता की गुहार और सम्राट का धर्मसंकट
एक बार शहंशाह अकबर का दरबार सजा हुआ था। तभी एक बूढ़ा और लाचार व्यक्ति रोता हुआ दरबार में दाखिल हुआ। उसके पीछे उसका नौजवान बेटा भी खड़ा था, जिसके चेहरे पर घमंड और बेरुखी साफ झलक रही थी। बूढ़े पिता ने रोते हुए अकबर के सामने घुटने टेक दिए और कहा, “जहाँपनाह! न्याय कीजिए। मेरे इस इकलौते बेटे ने मेरी पूरी जिंदगी की कमाई और हमारी पुश्तैनी ज़मीन धोखे से अपने नाम लिखवा ली है। अब यह मुझे इस बुढ़ापे में घर से बाहर निकाल रहा है।”
पिता की बात खत्म होते ही बेटे ने गुस्से में कहा, “यह बूढ़ा झूठ बोल रहा है, हुज़ूर! असल में यह ज़मीन मेरी ही है और यह शख्स केवल हमारे यहाँ काम करने वाला एक पुराना नौकर है, जो अब लालच में आकर खुद को मेरा पिता बता रहा है।”
शहंशाह अकबर इस अजीब मामले को देखकर धर्मसंकट में पड़ गए। बेटे के पास ज़मीन के सारे कागज़ात मौजूद थे और गाँव के कुछ रसूखदार गवाह भी, जिन्हें उसने पैसों के दम पर खरीद लिया था। दूसरी तरफ, उस बूढ़े पिता के पास अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए आँखों से बहते आँसुओं के सिवाय कुछ नहीं था। अकबर ने इस उलझन को सुलझाने का ज़िम्मा अपने सबसे बुद्धिमान मंत्री बीरबल को सौंपा।
बीरबल की अनोखी और भावुक परीक्षा
बीरबल ने दोनों पक्षों को ध्यान से देखा। वे समझ गए थे कि कागज़ात और गवाह झूठे हो सकते हैं, लेकिन एक पिता की आँखों का दर्द झूठा नहीं हो सकता। फिर भी, न्याय को साबित करने के लिए ठोस सबूत की ज़रूरत थी।
बीरबल ने मुस्कुराते हुए एक दरबान को बुलाया और कहा, “जाओ, तुरंत कोड़े लेकर आओ।”
पूरा दरबार हैरान रह गया कि आखिर बीरबल क्या करने वाले हैं। बीरबल ने कोड़ा हाथ में लिया और गंभीर आवाज़ में कहा, “चूँकि हमारे पास कोई सीधा गवाह नहीं है, इसलिए हम न्याय की एक प्राचीन परीक्षा करेंगे। जो भी इस संपत्ति का असली मालिक है, उसे अपनी शक्ति और अधिकार साबित करना होगा। इस कोड़े से बेटे को अपने पिता की पीठ पर पाँच कोड़े मारने होंगे, और फिर इस पिता को अपने बेटे की पीठ पर पाँच कोड़े मारने होंगे। जो बिना हिचकिचाहट के यह सजा पूरी करेगा, ज़मीन उसकी होगी।”
खुल गया झूठ का नकाब
बीरबल की बात सुनते ही लालची बेटे की आँखों में चमक आ गई। वह बिना एक पल गँवाए कोड़ा उठाने के लिए आगे बढ़ा। उसने बूढ़े पिता की तरफ देखा भी नहीं और कोड़ा हवा में लहराते हुए उन पर वार करने के लिए तैयार हो गया। बूढ़ा पिता डर से नहीं, बल्कि अपने ही बेटे की इस क्रूरता को देखकर भीतर से टूट गया और रो पड़ा।
इससे पहले कि कोड़ा बूढ़े की पीठ पर पड़ता, बीरबल ने चिल्लाकर कहा, “रुको!”
बीरबल ने कोड़ा उस लालची बेटे के हाथ से छीन लिया और उसे बूढ़े पिता के हाथ में थमाते हुए कहा, “अब तुम्हारी बारी है। अपने बेटे पर वार करो और अपनी संपत्ति वापस पा लो।”
बूढ़े पिता ने कांपते हाथों से कोड़ा पकड़ा। उसने अपने बेटे के चेहरे को देखा, जिसकी आँखों में अब डर था। पिता का दिल भर आया। उसने कोड़े को तुरंत ज़मीन पर फेंक दिया और रोते हुए बोला, “नहीं हुज़ूर! मैं अपनी ज़मीन हारने को तैयार हूँ, दर-दर की ठोकरें खाने को तैयार हूँ, लेकिन मैं अपने ही कलेजे के टुकड़े पर, अपने बेटे पर कोड़ा नहीं बरसा सकता। एक पिता का दिल यह ज़ुल्म कभी नहीं कर सकता।”
न्याय और सत्य की जीत
दरबार में गहरी खामोशी छा गई। कई दरबारियों की आँखें नम हो गईं। बीरबल ने सम्राट अकबर की तरफ देखा और कहा, “जहाँपनाह! न्याय हो चुका है। कागज़ात और गवाह खरीदे जा सकते हैं, लेकिन एक पिता का अपने पुत्र के लिए निस्वार्थ प्रेम कभी खरीदा नहीं जा सकता। जो अपनी ज़मीन के लिए पिता को मारने को तैयार है, वह दोषी है; और जो अपने बेटे की रक्षा के लिए अपनी संपत्ति छोड़ने को तैयार है, वही सच्चा पिता और असली मालिक है।”
अकबर बीरबल की इस भावुक और चतुर सूझबूझ से बेहद प्रभावित हुए। उन्होंने तुरंत लालची बेटे को जेल भेजने का हुक्म दिया और बूढ़े पिता को ससम्मान उनकी संपत्ति वापस दिलाई।
सीख: संसार में कोई भी धन, दौलत या ज़मीन माता-पिता के निस्वार्थ प्रेम और उनके बलिदान से बढ़कर नहीं हो सकती। चालाकी से आप दुनिया की जंग जीत सकते हैं, लेकिन ईश्वर की अदालत में जीत हमेशा सच्चे रिश्तों की ही होती है।