चमत्कारों की नई बहार: अब CJP बदलेगी देश के स्कूलों की तकदीर, बाकी सब तो ‘ठीक’ है ही!

वाह! युग बदल गया, इतिहास पलट गया और हमारे भाग्य तो मानो सातवें आसमान पर पहुंच गए। देश की राजनीति में एक ऐसी अभूतपूर्व क्रांति आई है कि खुद मीडिया भी अपनी आंखें मलाई मार-मारकर मल रहा है। खबर आई है कि पहले परीक्षा सुधार और अब ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान चलाकर ‘CJP’ राजनीति की पूरी दिशा और दशा बदल रही है। सचमुच, इस ऐतिहासिक बदलाव को देखकर हमारी आंखों में खुशी के आंसू आ गए हैं, बिल्कुल वैसे ही आंसू जो प्याज काटते समय बिना मांगे आ जाते हैं।

क्रांति का नया रूप: जब पाठशाला बनी राजनीति का नया खिलौना

अब तक हमारी राजनीति का स्तर कितना महान और पारलौकिक था—धर्म, जाति, मुफ्त की रेवड़ियां और विरोधियों को कोसना। लेकिन धन्य हो CJP, जिसने इस पूरी घिसी-पिटी व्यवस्था को तगड़ा झटका दे दिया है। उन्होंने अचानक यह अद्भुत खोज कर ली है कि इस देश में ‘स्कूल’ नाम की भी कोई इमारत होती है और वहां देश का भविष्य यानी बच्चे पढ़ने जाते हैं! दशकों तक शिक्षा व्यवस्था को वेंटिलेटर पर रखने के बाद, अब अचानक ‘स्कूल ठीक करो’ का नारा देना वैसा ही है जैसे पूरे साल बच्चे को न पढ़ाकर परीक्षा के ठीक एक रात पहले उसे ‘टॉप’ करने का आशीर्वाद देना।

पहले परीक्षा सुधार का ढोल पीटा गया। यह वही महान परीक्षा प्रणाली है जहां पेपर लीक होना किसी राष्ट्रीय उत्सव की तरह नियमित रूप से मनाया जाता है। अब CJP इस व्यवस्था को ‘सुधार’ रही है। शायद सुधार का मतलब यह है कि अब पेपर लीक होने की खबरें अखबारों के बजाय सीधे सोशल मीडिया रील्स के जरिए पहुंचाई जाएंगी! और अब इस ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान के तहत सरकारी स्कूलों की जर्जर दीवारों को चमचमाते पोस्टरों से ढक दिया जाएगा, ताकि गरीबी और बदहाली बाहर से दिखाई ही न दे। वाह, इसे कहते हैं असली विमर्श बदलना!

काक-वाणी की खरी-खरी: विमर्श बदला है या सिर्फ चुनावी मौसम का मिजाज?

काक-वाणी की मुंडेर पर बैठकर जब हमने इस ‘बदलते विमर्श’ का बारीकी से विश्लेषण किया, तो समझ आया कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है। जब-जब चुनाव नजदीक आते हैं, नेताओं को अचानक बच्चों के भविष्य और स्कूलों के टूटे हुए छप्परों की याद सताने लगती है। इस ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान का असली और गुप्त संदेश शायद यही है कि ‘अगले चुनाव तक हमारी किस्मत ठीक कर दो, स्कूल तो वैसे भी भगवान भरोसे चल ही रहे हैं।’

प्रिय जनता, इस नए राजनीतिक ड्रामे का पूरा आनंद लीजिए। परीक्षा सुधरे न सुधरे, स्कूल की छत ठीक हो न हो, लेकिन नेताओं की पीआर एजेंसियों की तिजोरियां जरूर ठीक हो रही हैं। अगली बार जब कोई नेता आपके बच्चे के स्कूल को ‘ठीक’ करने का दावा करे, तो उनसे बस इतना पूछ लीजिएगा कि पिछले पांच सालों से वे किस स्कूल में अपनी राजनीतिक रोटियां सेक रहे थे?


संदर्भ मुख्य समाचार: यहाँ देखें

कागा जी