राजनीति की ‘परम मोक्ष’ योजना: प्रियंक खरगे का संन्यास कार्ड!

राम-राम भाइयों! ‘काक-वाणी’ के इस तीखे बुलेटिन में आपका स्वागत है। हमारे देश के नेताओं की रीढ़ की हड्डी इतनी लचीली होती है कि वे किसी भी मोड़ पर ‘त्याग और तपस्या’ का ऐसा योगासन कर सकते हैं, जिसे देखकर योग गुरु भी शरमा जाएं। ताजा मामला कर्नाटक के शूरवीर प्रियंक खरगे जी का है। उन्होंने दहाड़ते हुए घोषणा की है कि अगर भर्ती गड़बड़ी में उनका हाथ साबित हो गया, तो वे राजनीति ही छोड़ देंगे! वाह, क्या बात है! इस ‘महा-त्याग’ की घोषणा सुनकर हमारी आंखों में आंसुओं का सैलाब आ गया है।

राजनीति छोड़ने की धमकी: नेताओं का सबसे प्रिय खिलौना

भारतीय लोकतंत्र में ‘मैं राजनीति छोड़ दूंगा’ वैसी ही कसम है, जैसी कसम प्रेमी अपनी प्रेमिका को ‘चांद-तारे तोड़ लाने’ की देता है। दोनों पक्षों को अच्छी तरह पता है कि न तो चांद जमीन पर आने वाला है और न ही नेताजी अपना एसी दफ्तर छोड़कर हरिद्वार जाने वाले हैं। प्रियंक जी, आपके इस ‘भीष्म प्रतिज्ञा’ से कर्नाटक के बेरोजगार युवा इतने सहम गए हैं कि वे भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं कि हे प्रभु! चाहे नौकरी घोटाले की जांच कभी पूरी न हो, लेकिन हमारे प्यारे नेताजी को राजनीति से संन्यास मत दिलवाना। आखिर उनके बिना विधानसभा में मनोरंजन कौन करेगा?

‘अगर साबित हुआ…’ – इस एक शब्द में छिपा है असली खेल

इस पूरे बयान की असली खूबसूरती उस एक छोटे से शब्द में छिपी है – ‘अगर’। ‘अगर आरोप साबित हुआ तो…’। अब हमारे देश में जांच की कछुआ चाल तो जगजाहिर है। जब तक किसी घोटाले की जांच तार्किक परिणति तक पहुंचती है, तब तक आरोपी नेता के पोते-पोतियां भी राजनीति में आकर अपनी सीट पक्की कर चुके होते हैं। तब तक न तो वह फाइलें बचती हैं और न ही वह गवाह। ऐसे में प्रियंक जी का यह दांव सीधे तौर पर ‘फ्री हिट’ पर शॉट खेलने जैसा है, जहां आउट होने का कोई चांस ही नहीं है।

काक-वाणी की मुफ्त सलाह

काक-वाणी के मंच से हम प्रियंक खरगे जी को एक मुफ्त की सलाह देना चाहते हैं। नेताजी, अगली बार जब जनता के सामने ऐसी कसम खाएं, तो थोड़ा नया स्क्रिप्ट लिखवाएं। यह ‘राजनीति छोड़ दूंगा’ वाला डायलॉग अब इतना घिस चुका है कि इस पर नुक्कड़ नाटक के दर्शक भी ताली नहीं बजाते। वैसे भी, भारतीय राजनीति में नेता कभी ‘रिटायर’ नहीं होते, वे केवल ‘मार्गदर्शक मंडल’ में प्रमोट होते हैं। इसलिए निश्चिंत रहिए, जांच की फाइलें धूल खाती रहेंगी और आपकी राजनीति की दुकान यूं ही सजती रहेगी। जनता तो बस आपके इस ड्रामे पर ताली बजाने के लिए ही बनी है!


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कागा जी