शहंशाह अकबर के दरबार में वैसे तो रोज ही नए और पेचीदा मामले आते थे, लेकिन उस दिन महल का माहौल बेहद गमगीन था। अकबर की दिवंगत अम्मी की आखिरी निशानी, एक सोने की अंगूठी जिसमें उनकी माँ की तस्वीर जड़ी थी, चोरी हो गई थी। शहंशाह के लिए वह अंगूठी बेशकीमती थी क्योंकि उसमें उनकी माँ का आशीर्वाद और ममता बसी थी। गुस्से और दुख से तड़पते हुए अकबर ने ऐलान किया कि जिसने भी यह गुस्ताखी की है, उसे सख्त सजा दी जाएगी।
मासूम पर लगा चोरी का इल्जाम
संदेह के घेरे में रामू नाम का एक वृद्ध और बेहद वफादार सेवक आया, जो सालों से शहंशाह के निजी कक्ष की सफाई करता था। रामू की आँखों में आंसू थे, वह बार-बार रोते हुए कह रहा था, “हुजूर, मैंने चोरी नहीं की। मैंने तो हमेशा इस महल को अपना मंदिर माना है।” लेकिन परिस्थितियाँ उसके खिलाफ थीं, क्योंकि उस दिन केवल वही उस कमरे में गया था। अकबर ने गुस्से में आकर रामू को कारागार में डालने का हुक्म दे दिया। रामू की छोटी बेटी बिलख-बिलख कर रो रही थी। उसने बीरबल के पैर पकड़ लिए और न्याय की गुहार लगाई।
बीरबल की अनोखी और भावुक परीक्षा
लड़की का रोना देखकर बीरबल का दिल पसीज गया। वे जानते थे कि रामू जैसा वफादार व्यक्ति ऐसा घिनौना काम नहीं कर सकता। बीरबल ने शहंशाह से इस गुत्थी को सुलझाने के लिए एक दिन की मोहलत मांगी। अगले दिन बीरबल ने सभी दरबारियों और सेवकों को बुलाया, जिसमें वह अमीर दरबारी भी शामिल था जिसने वास्तव में अंगूठी चुराई थी।
बीरबल ने दरबार के बीचों-बीच एक जलता हुआ मिट्टी का दीपक रखा और कहा, “शहंशाह, यह कोई साधारण दीपक नहीं है। यह आपकी पूजनीय अम्मी की याद का प्रतीक है। जो भी इस दीपक को छुएगा और अपनी माँ की कसम खाएगा कि उसने चोरी नहीं की, वह बच जाएगा। लेकिन अगर चोर ने इसे छुआ, तो उसकी माँ की आत्मा उसे तुरंत श्राप दे देगी और उसके हाथ काले पड़ जाएंगे।” वास्तव में, बीरबल ने दीपक के पिछले हिस्से पर एक विशेष अदृश्य कालिख लगाई थी।
सच्चाई की जीत
सभी दरबारी और सेवक बारी-बारी से आए और अपनी माँ की कसम खाकर दीपक को छूने लगे। रामू ने कांपते हाथों से दीपक को छुआ, उसकी आँखों में कोई डर नहीं था, बस अपनी दिवंगत मालकिन के प्रति सम्मान था। अंत में, उस अमीर दरबारी की बारी आई जिसने सचमुच चोरी की थी। वह अंधविश्वासी था और अपनी माँ के अनिष्ट के डर से कांपने लगा। जब उसने दीपक को छुआ, तो उसने केवल छूने का नाटक किया और अपनी हथेलियों को दीपक से पूरी तरह सटने नहीं दिया।
सभी के जाने के बाद बीरबल ने तुरंत सभी को हाथ ऊपर करने को कहा। रामू समेत सभी के हाथ काले थे, क्योंकि उन्होंने सच्चे दिल से दीपक को छुआ था। लेकिन उस अमीर दरबारी के हाथ बिल्कुल साफ थे। बीरबल मुस्कुराए और बोले, “शहंशाह, असली चोर यही है। इसे अपनी माँ की झूठी कसम खाने से इतना डर था कि इसने दीपक को ढंग से छुआ तक नहीं।”
दरबारी ने घबराकर अपना जुर्म कबूल कर लिया और अंगूठी वापस कर दी। अकबर की आँखों में आंसू आ गए। उन्होंने रामू को तुरंत रिहा कराया, उसे इनाम दिया और बीरबल की चतुर न्याय-प्रणाली की दिल से तारीफ की।
कहानी से सीख
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि सच्चाई और ईमानदारी में अटूट शक्ति होती है। बुरा काम करने वाला इंसान चाहे कितना भी चालाक क्यों न हो, उसका अपना डर और अंतरात्मा ही एक दिन उसे सबके सामने बेनकाब कर देती है। न्याय हमेशा बुद्धि और संवेदनशीलता की राह पर चलकर ही मिलता है।