वाह! क्या गजब की अंतरराष्ट्रीय कूटनीति है। संयुक्त राष्ट्र (UN) में एक बड़ा सुधार होने जा रहा है—वह भी नक्शों का! जी हां, दुनिया भर के देशों की सीमाएं जो अक्सर कागजों पर खिसकती रहती हैं, उन्हें सुधारने के लिए भारत ने अपना बहुमूल्य और ऐतिहासिक समर्थन दे दिया है। भारत चाहता है कि दुनिया के नक्शे एकदम सटीक हों, साफ-सुथरे हों और उनमें कोई मिलावट न हो। लेकिन, ठहरिए! जैसे ही बात जम्मू-कश्मीर और लद्दाख की आती है, हमारी कूटनीतिक उंगली उठ जाती है और हम कह देते हैं—’खबरदार! वहां अपनी पेंसिल भी मत ले जाना, वरना हमारी कूटनीति का रबर तैयार बैठा है।’
नक्शे तुम्हारे, सीमाएं हमारी: कूटनीति का नया खेल
भारत सरकार का रुख एकदम साफ और पारदर्शी है। हमें वैश्विक सुधारों से कोई गुरेज नहीं है। संयुक्त राष्ट्र अगर पूरी दुनिया का भूगोल दुरुस्त करना चाहता है, तो हमारे विदेश मंत्रालय के अधिकारी अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर ताली बजाएंगे। लेकिन अगर किसी विदेशी कार्टोग्राफर (नक्शा बनाने वाले) के हाथ में थोड़ी भी खुजली हुई और उसने कश्मीर या लद्दाख की रेखाओं के साथ कोई ‘रचनात्मक प्रयोग’ करने की कोशिश की, तो हमारे विदेश मंत्री एस जयशंकर साहब अपनी चश्मा ठीक करते हुए ऐसा कड़ा रुख अपनाएंगे कि सामने वाले का भूगोल ही हिल जाए। आखिर हमारी ‘कड़ी निंदा’ की मशीन हमेशा हाई-ऑक्टेन फ्यूल पर जो चलती है!
कागजी सीमाओं का असली सच
इतिहास गवाह है कि जब-जब संयुक्त राष्ट्र ने नक्शों में हेर-फेर करने की कोशिश की है, तब-तब भारत ने अपनी संप्रभुता का ऐसा मजबूत किला खड़ा किया है कि नक्शा बनाने वाले खुद भूल जाते हैं कि उन्होंने रेखा खींची कहां थी। वैसे, यह देखना वाकई दिलचस्प है कि जमीन पर चाहे पड़ोसी देश अपनी नापाक हरकतें जारी रखें, हमारी असली और सबसे बड़ी जंग तो ‘गूगल मैप्स’ और ‘यूएन के दस्तावेजों’ से होती है। अगर वहां हमारा मुकुट सीधा है, तो मानिए देश में सब चंगा सी!
काक-वाणी का मानना है कि यह नक्शा सुधारने का प्रस्ताव वाकई क्रांतिकारी है। अब कम से कम संयुक्त राष्ट्र के वातानुकूलित दफ्तरों में धूल खा रहे कागजों पर तो हमारी सीमाएं सुरक्षित रहेंगी। रही बात जमीनी हकीकत की, तो कूटनीति के चश्मे से देखने पर जमीन से ज्यादा कागज का टुकड़ा कीमती नजर आता है। इसलिए, दुनिया सुधरे न सुधरे, नक्शा जरूर सुधरना चाहिए!
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