मिट्टी का दीया और सोने की मूरत: जीवन का सच

एक मूर्तिकार की अनोखी चुनौती

बहुत समय पहले की बात है, एक शांत नदी के किनारे बसे गाँव में माधव नाम का एक वृद्ध मूर्तिकार रहता था। माधव बहुत ही साधारण जीवन जीता था, लेकिन उसकी बनाई मूर्तियों में जैसे साक्षात प्राण बसे होते थे। एक दिन, उस राज्य का सबसे अमीर और घमंडी व्यापारी धनीराम उसके पास आया। धनीराम के पास अथाह धन-दौलत थी, लेकिन उसके मन में अजीब सी अशांति और अकेलापन था। उसने माधव से कहा, “मैंने सुना है तुम अपनी कला से मिट्टी में भी जान फूंक देते हो। मुझे कोई ऐसी कलाकृति बनाकर दो, जो मुझे जीवन का सच समझा सके और मेरे मन को शांति दे। अगर तुमने ऐसा कर दिया, तो मैं तुम्हें सोने की सौ मोहरें दूंगा।”

तीन मूर्तियां और तीन सच

माधव मुस्कुराया और उसने शांत भाव से तीन दिन का समय माँगा। तीन दिन बाद, धनीराम बेहद उत्सुकता के साथ मूर्तिकार की कुटिया में पहुँचा। माधव ने उसके सामने मखमली कपड़े से ढकी हुई तीन आकृतियाँ रखीं। जब उसने पहली आकृति से कपड़ा हटाया, तो वहाँ विशुद्ध सोने की बनी एक सुंदर स्त्री की मूरत थी, जो बाहर से बेहद चमकदार थी, लेकिन अंदर से पूरी तरह खोखली थी। माधव ने कहा, “यह हमारा अहंकार और बाहरी दिखावा है, जो दुनिया को तो चमकता हुआ दिखता है, पर भीतर से बिलकुल खाली और बेजान होता है।”

फिर माधव ने दूसरी आकृति से कपड़ा हटाया। वह एक सख्त काले पत्थर की मूरत थी, जो बहुत मजबूत थी लेकिन छूने पर बहुत ठंडी और कठोर थी। माधव ने समझाया, “यह हमारा क्रोध, लालच और कठोर स्वभाव है। यह हमें बाहर से शक्तिशाली तो दिखाता है, लेकिन हमारे भीतर की सभी मानवीय संवेदनाओं और प्रेम को मार देता है।”

मिट्टी का दीया और जीवन की सीख

अंत में, माधव ने तीसरी आकृति से कपड़ा हटाया। वहाँ एक साधारण मिट्टी का दीया रखा था, जिसके अंदर एक नन्हा सा हरा-भरा पौधा उग रहा था और उस दीये के ठीक बीच में एक छोटा सा दर्पण लगा था। धनीराम ने हैरान होकर पूछा, “माधव, यह तीसरी साधारण सी आकृति क्या दर्शाती है?”

माधव की आँखों में आँसू आ गए। उसने नम्रता से कहा, “महोदय, यही हमारे जीवन का सच है। यह मिट्टी का दीया हमारा नश्वर शरीर है, जो एक दिन इसी मिट्टी में मिल जाएगा। इसके भीतर उगता हुआ यह नन्हा पौधा हमारा निस्वार्थ प्रेम, दया और सेवा भाव है, जो हमारे जाने के बाद भी संसार में जीवित रहता है। और इसके बीच लगा यह दर्पण हमें दिखाता है कि ईश्वर और असली खुशी कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारे अपने ही भीतर वास करती है।”

धनीराम की आँखें खुलीं

यह सुनते ही धनीराम के पैर कांपने लगे। उसे अपनी पूरी जिंदगी एक खाली पन्ने की तरह महसूस होने लगी, जहाँ उसने सिर्फ सोने (दिखावे) और पत्थर (कठोरता) को इकट्ठा किया था, और अपनों के प्यार व आंतरिक शांति को खो दिया था। उसकी आँखों से पश्चाताप के आँसू बहने लगे। उसने माधव के चरणों में सिर झुका दिया और अपनी धन-दौलत का एक बड़ा हिस्सा गरीबों की भलाई में लगाने का संकल्प लिया।

कहानी की सीख

सीख: जीवन का असली सच बाहरी धन-दौलत या दिखावे में नहीं है। हमारा शरीर मिट्टी का है और एक दिन मिट्टी में मिल जाएगा। केवल हमारा दूसरों के प्रति प्रेम, दया और हमारे अच्छे कर्म ही इस दुनिया में हमेशा जीवित रहते हैं। असली खुशी हमारे भीतर के संतोष में है।

कागा जी