सुंदरवन का हरा-भरा संसार
बहुत समय पहले की बात है, सुंदरवन के बीचों-बीच एक विशाल और पुराना बरगद का पेड़ था। वन के सभी जीव उसे “बरगद दादा” कहकर बुलाते थे। उस पेड़ की घनी छांव में सैकड़ों पक्षी अपने घोंसले बनाकर रहते थे। उन्हीं में से एक थी “चीकू” नाम की नन्ही और चुलबुली चिड़िया। चीकू के माता-पिता बचपन में ही उसे छोड़ गए थे, इसलिए बरगद दादा ने ही उसे अपनी शाखाओं के आंचल में पाल-पोसकर बड़ा किया था। चीकू भी बरगद दादा को ही अपना सब कुछ मानती थी और दिनभर उनके पत्तों के बीच चहकती रहती थी।
जब विपदा ने दी दस्तक
समय का चक्र बदला और सुंदरवन में भीषण अकाल पड़ा। कई महीनों तक बारिश की एक बूंद भी नहीं गिरी। नदियां-तालाब सूखने लगे और पेड़-पौधे कुम्हलाने लगे। बरगद दादा के पत्ते भी धीरे-धीरे पीले होकर गिरने लगे। जंगल के अधिकांश पक्षी और जानवर भोजन और पानी की तलाश में वह स्थान छोड़कर दूसरे जंगलों की ओर जाने लगे।
एक सुबह, चीकू के पड़ोसियों ने उसे भी साथ चलने को कहा। लेकिन चीकू ने बरगद दादा को अकेले छोड़कर जाने से साफ मना कर दिया। उसने कहा, “जिन्होंने मुझे जन्म के बाद से सहारा दिया, आज मुसीबत के समय मैं उन्हें अकेला छोड़कर खुद को बचाने के लिए कैसे भाग सकती हूँ?”
बरगद दादा ने अपनी कमजोर आवाज में चीकू से कहा, “बेटी चीकू, तुम यहाँ रहोगी तो भूख-प्यास से मर जाओगी। तुम चली जाओ, मेरा अंत निकट है।” चीकू की आंखों में आंसू आ गए। उसने अपनी नन्हीं चोंच से बरगद के तने को छुआ और कहा, “दादा, जिएंगे तो साथ और मरेंगे तो साथ।”
बरगद का अंतिम बलिदान और सच्ची वफादारी
चीकू रोज़ उड़कर बहुत दूर जाती और किसी तरह अपनी चोंच में पानी की कुछ बूंदें भरकर लाती और बरगद की जड़ों में डाल देती। नन्ही चिड़िया की इस निष्काम सेवा और असीम प्रेम को देखकर जंगल की मिट्टी भी रो पड़ी। चीकू दिन-रात की दौड़भाग से थककर चूर हो चुकी थी, लेकिन उसकी हिम्मत नहीं टूटी थी।
एक दोपहर, तेज धूप और प्यास के कारण चीकू बेहोश होकर जमीन पर गिरने लगी। यह देखकर बरगद दादा से रहा नहीं गया। उन्होंने अपनी बची-कुची आखिरी जीवन-शक्ति को समेटा और अपनी सूखी शाखाओं को झुकाकर चीकू पर छांव कर दी। उन्होंने अपने तने के भीतर संचित अंतिम जल की बूंद को चीकू के सूखे मुंह में टपका दिया। चीकू की जान तो बच गई, लेकिन इस अंतिम प्रयास में बरगद दादा पूरी तरह सूख गए और बेजान हो गए।
जब चीकू को होश आया, तो उसने अपने कृपालु रक्षक को मृतप्राय पाया। वह बरगद की सूखी टहनी से लिपटकर फूट-फूट कर रोने लगी। उसका क्रंदन इतना सच्चा और दर्दनाक था कि बादलों के देवता इंद्र का हृदय भी पिघल गया। नन्ही चिड़िया के निस्वार्थ प्रेम और बरगद के महान बलिदान से प्रसन्न होकर इंद्रदेव ने सुंदरवन में मूसलाधार बारिश कर दी। देखते ही देखते पूरा जंगल फिर से हरा-भरा हो गया और बरगद दादा के भीतर भी नए प्राणों का संचार हो गया।
कहानी से सीख
इस पंचतंत्र की नैतिक कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि संकट के समय अपनों का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए। सच्चा प्रेम, निष्ठा और वफादारी न केवल कठिन से कठिन परिस्थितियों को बदल सकती है, बल्कि ईश्वर भी सच्चे और निस्वार्थ भाव के आगे झुक जाते हैं। स्वार्थ का त्याग कर किया गया परोपकार ही जीवन का असली आधार है।