राहुल बाबा की ‘कान खोलो यात्रा’ और जनता की ‘चुप रहो’ प्रार्थना

राम-राम भाइयों और उनकी बहनों! ‘काक-वाणी’ की मुंडेर पर आपका स्वागत है। आज हमारे कौवे थोड़े भावुक हैं। वजह? कांग्रेस का वह ऐतिहासिक दावा, जिसमें कहा गया है कि राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ कोई ‘मन की बात’ सुनाने का मंच नहीं थी, बल्कि ‘जनता की चिंता’ सुनने का एक महा-अभियान थी। वाह! सुनकर ही आंखों में आंसू और कानों में शहद घुल गया।

जब ‘मन की बात’ के मुकाबले आया ‘कान का इलाज’

अब तक देशवासी रेडियो के सामने बैठकर एकतरफा प्रवचन सुनने के आदी हो चुके थे। जनता सोचती थी कि लोकतंत्र का मतलब ही यही है कि आप चुपचाप बैठें और ‘मन की बात’ सुनें। लेकिन फिर हमारे ‘युवा’ नेता (जो अब दाढ़ी बढ़ाकर अत्यंत गंभीर दिखने लगे हैं) ने सोचा कि नहीं, अब बहुत हुआ! अब जनता को नहीं, बल्कि नेता को चुप रहना पड़ेगा। कांग्रेस के इस बयान ने साफ़ कर दिया है कि यह यात्रा राजनीति के इतिहास में एक ‘कान खोलो अभियान’ थी। राहुल बाबा ने हजारों किलोमीटर पैदल चलकर यह साबित कर दिया कि उनके पास न सिर्फ मजबूत पैर हैं, बल्कि बेहद मजबूत और संवेदनशील कान भी हैं।

चिंता जनता की या चुनाव की?

लेकिन ठहरिए, एक कौवा कान में फुसफुसा रहा है कि ‘जनता की चिंता’ सुनना और ‘अपनी चिंता’ को जनता के सिर मढ़ना, दो अलग बातें हैं। जनता तो वर्षों से महंगाई, बेरोजगारी और टूटी सड़कों पर चिल्ला रही थी, लेकिन उसे सुनने के लिए साढ़े तीन हजार किलोमीटर पैदल चलने की क्या जरूरत थी? दिल्ली के दफ्तर में बैठकर भी सोशल मीडिया पर ‘चिंता’ सुनी जा सकती थी। खैर, शायद पैदल चलने से कानों के पर्दे ज्यादा बेहतर तरीके से खुलते हैं। कांग्रेस का कहना है कि यह यात्रा सिर्फ राजनीतिक नहीं थी। बिल्कुल सही बात है! जब चुनाव हारने का डर हो, तो राजनीति को ‘तपस्या’ का नाम दे देना ही सबसे सुरक्षित विकल्प होता है।

चुप रहने की कला और काक-दृष्टि

अंत में, ‘काक-वाणी’ तो बस यही कहेगी कि चाहे ‘मन की बात’ हो या ‘जनता की चिंता’, आम आदमी का भाग्य वही रहता है—पिसना! एक तरफ वो हैं जो सिर्फ बोलते हैं, और दूसरी तरफ वो हैं जो सुनने का दावा तो करते हैं, पर सत्ता मिलते ही फिर से बहरे हो जाते हैं। राहुल बाबा ने सुन तो लिया, अब देखना यह है कि इस ‘सुनवाई’ के बाद कांग्रेस की अपनी ‘चिंता’ दूर होती है या नहीं, वरना जनता तो वैसे भी हमेशा ‘चिंतामग्न’ ही रहती है।


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कागा जी