एक अनोखा परिवार और गहरा स्नेह
सुंदर वन के किनारे बसे एक छोटे से गाँव में देवदत्त और उसकी पत्नी माधवी रहते थे। शादी के कई वर्षों बाद उनके घर एक प्यारे से बेटे का जन्म हुआ। उसी समय, माधवी को जंगल में एक लावारिस, छोटा सा नेवले का बच्चा मिला। ममता से भरी माधवी ने उस नेवले को भी अपने बेटे की तरह ही पाला। वह कहती, “यह नेवला नहीं, मेरे बेटे का बड़ा भाई है।” दोनों बच्चे एक साथ खेलते और एक ही आँगन में बड़े होने लगे।
संदेह की पहली किरण
जैसे-जैसे समय बीता, गाँव के लोग माधवी को टोकने लगे। वे कहते, “पशु आखिर पशु ही होता है। तुम एक जंगली जानवर पर इतना भरोसा कैसे कर सकती हो? कभी भी इसके भीतर का जानवर जाग सकता है और तुम्हारे बच्चे को नुकसान पहुँचा सकता है।” माधवी लोगों की बातें टाल देती, लेकिन कहीं न कहीं उसके मन के एक कोने में संदेह का एक छोटा सा बीज बो दिया गया था।
वह भयानक दोपहर
एक दोपहर, देवदत्त भिक्षा लेने पास के गाँव गया हुआ था। माधवी को कुएं से पानी भरने जाना था। उसने अपने सोए हुए बेटे को देखा और फिर नेवले की तरफ देखा, जो पालने के पास ही बैठा था। माधवी का मन थोड़ा घबराया। उसने नेवले से कहा, “मेरे बच्चे का ध्यान रखना,” और घड़ा लेकर चली गई।
माधवी के जाते ही, कमरे की खिड़की से एक जहरीला काला नाग अंदर रेंग आया। वह सीधे सोते हुए बच्चे के पालने की ओर बढ़ने लगा। वफादार नेवले ने खतरे को भांप लिया। अपनी जान की परवाह किए बिना, वह सांप पर टूट पड़ा। दोनों के बीच भयंकर लड़ाई हुई। अंततः, नेवले ने सांप के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। नेवले का मुंह और पंजे सांप के खून से सन गए थे। वह खुशी और गर्व से दरवाजे पर आकर बैठ गया, इस उम्मीद में कि उसकी माँ आकर उसे शाबाशी देगी।
जल्दबाजी का खूनी परिणाम
जब माधवी पानी लेकर लौटी, तो उसने दरवाजे पर खून से सने नेवले को देखा। उसका दिमाग सुन्न हो गया। लोगों की कही बातें उसके कानों में गूंजने लगीं। उसने सोचा, “इस दुष्ट नेवले ने मेरे बच्चे को मार डाला!”
बिना सोचे-समझे, गुस्से और गहरे दुख में पागल होकर, माधवी ने पानी से भरा भारी घड़ा पूरी ताकत से नेवले के ऊपर पटक दिया। एक दर्दनाक चीख के साथ, उस बेजुबान वफादार जीव ने वहीं दम तोड़ दिया।
पछतावे के आंसू
रोती-बिलखती माधवी अंदर दौड़ी। उसने देखा कि उसका बेटा शांति से सो रहा था और पालने के पास एक काले सांप के टुकड़े बिखरे पड़े थे। माधवी को सब समझ आ गया। उसने अपने रक्षक को ही मार डाला था।
माधवी नेवले के बेजान शरीर को अपनी छाती से लगाकर फूट-फूट कर रोने लगी। उसका क्रंदन पूरे गाँव में गूंज उठा, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। जल्दबाजी और अविश्वास ने एक निर्दोष की जान ले ली थी।
कहानी से सीख
सीख: इस पंचतंत्र की नैतिक कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि क्रोध या घबराहट में बिना सोचे-समझे लिया गया निर्णय हमेशा विनाशकारी होता है। किसी भी कार्य को करने से पहले सत्य की जांच अवश्य करनी चाहिए, अन्यथा जीवनभर का पछतावा ही हाथ रहता है।