चाबहार का ‘चाय-पानी’ और राजनीति से परे का ‘रूहानी’ इश्क!

जब इश्क ‘राजनीति’ से ऊपर उठकर ‘चाबहार’ पर अटक जाए!

वाह! क्या दिव्य ज्ञान मिला है। रूस के कज़ान में ‘ब्रिक्स’ (BRICS) की गर्मजोशी के बीच, जब हमारे परम आदरणीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान के नए-नवेले राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान से हाथ मिलाया, तो दुनिया के सारे दुःख-दर्द काफूर हो गए। ईरान के एक महान विशेषज्ञ ने टीवी पर आकर ऐसी बात कह दी कि आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने बड़े गर्व से फरमाया, “भारत और ईरान के रिश्ते राजनीति से परे हैं!”

जी हां, बिल्कुल सही सुना आपने—’राजनीति से परे’। इस ‘परे’ शब्द में कितनी गहराई है, यह सिर्फ एक कूटनीतिक कौआ ही समझ सकता है। जब अमेरिका ईरान पर प्रतिबंधों का डंडा चलाता है, तो हमारा यह ‘राजनीति से परे’ वाला प्यार थोड़ा डगमगा जाता है। लेकिन जैसे ही चीन बीच में टांग अड़ाता है, हमें अचानक चाबहार बंदरगाह की ‘ऐतिहासिक और सांस्कृतिक’ याद सताने लगती है। यह रिश्ता कूटनीतिक कम और किसी बॉलीवुड की त्रिकोणीय प्रेम कहानी जैसा ज्यादा लगता है, जहां विलेन की भूमिका में हमेशा ‘अंकल सैम’ खड़े रहते हैं।

कतरन कूटनीति और तेल की धार

हमारा रिश्ता इतना रूहानी है कि हम ईरान से सस्ता तेल खरीदना चाहते हैं, लेकिन खरीद नहीं पाते क्योंकि बीच में ‘ग्लोबल चौधरी’ आड़े आ जाता है। वैसे, विशेषज्ञों का क्या है, उनका काम तो टीवी स्टूडियो में बैठकर कूटनीति को ‘सूफी संगीत’ की तरह पेश करना है। जब मोदी जी और पेजेश्कियान साहब मुस्कुराते हुए कैमरे की तरफ देख रहे थे, तो मानों ऐसा लग रहा था कि दोनों ही एक-दूसरे से पूछ रहे हों—”भाई, अगली बार वॉशिंगटन में किसकी सरकार बन रही है?” क्योंकि सारा ‘राजनीति से परे’ का खेल तो उसी एक चुनाव पर टिका है।

‘काक-वाणी’ का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जब भी कोई एक्सपर्ट कहे कि रिश्ते ‘राजनीति से परे’ हैं, तो समझ जाइए कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है। इसका सीधा कूटनीतिक मतलब होता है—”हम एक-दूसरे के सीधे काम तो नहीं आ सकते, लेकिन चलिए कैमरे के सामने गले मिलकर दुनिया को अपनी ‘केमिस्ट्री’ जरूर दिखा सकते हैं।”

आखिरी कड़क चाय

खैर, ब्रिक्स की इस चाय पार्टी से अंततः हमें क्या मिला? हमारे साहब की एक और शानदार वैश्विक तस्वीर, ईरान की तरफ से पुरानी दोस्ती की कसमें, और हमारे लिए पेट्रोल-डीजल की वही पुरानी कड़वी कीमतें। रिश्ता भले ही राजनीति से परे आसमान में उड़ रहा हो, लेकिन जनता की जेब तो इसी धरती की राजनीति के थपेड़ों से खाली होती है। क्यों, सही कहा न?


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कागा जी