नीले रंग का पेटेंट: जब यूपी के ‘समाजवाद’ को ‘मायावी’ आसमानी से इश्क हो गया

उत्तर प्रदेश की राजनीति इतनी ‘रंगीन’ हो चुकी है कि अब वैज्ञानिकों को भी अपने लाइट स्पेक्ट्रम की चिंता होने लगी है। राज्य में बेरोजगारी, महंगाई और सड़कों के गड्ढे जैसी मामूली समस्याएं तो कब की हल हो चुकी हैं। अब बस एक ही यक्ष प्रश्न बचा है – ‘नीला रंग आखिर किसका है?’ एनडीटीवी की रिपोर्ट ने इस गंभीर राष्ट्रीय संकट पर प्रकाश डाला है, जहां समाजवादी पार्टी के टीपू (अखिलेश यादव) और बहुजन समाज पार्टी की बहनजी (मायावती) के बीच नीले रंग की मिल्कियत को लेकर महाभारत छिड़ गया है।

लाल टोपी में नीले का तड़का: समाजवाद का नया फैशन शो

अखिलेश बाबू को अचानक ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के रास्ते पर चलते-चलते अहसास हुआ कि लाल टोपी के साथ नीला कोट या नीली होर्डिंग कितनी सुहानी लगती है। ‘काक-वाणी’ के सूत्रों के अनुसार, समाजवादियों ने इस बार नीले रंग को ऐसे अपनाया है मानो उन्होंने इंद्रधनुष से सीधे ‘दलित वोटों’ का शॉर्टकट ढूंढ लिया हो। अखिलेश जी का मानना है कि आसमान नीला है, समंदर नीला है, तो फिर इस रंग पर सिर्फ बसपा का ही कॉपीराइट क्यों हो? वैसे भी, राजनीति में गिरगिट की तरह रंग बदलने की परंपरा पुरानी है, तो एक नया रंग आजमाने में क्या हर्ज है? समाजवाद अब बहुरंगी हो चुका है, बस उसमें से भगवा रंग को छोड़ दीजिए!

बहनजी का कॉपीराइट क्लेम: रंग हमारा, वोट तुम्हारा नहीं चलेगा!

दूसरी तरफ, बहनजी इस ‘रंग-चोरी’ से बेहद खफा हैं। उनका गुस्सा वैसा ही है जैसे कोई अपनी मनपसंद डिजाइन की साड़ी किसी और को पहने देख ले। बसपा का साफ कहना है कि नीला रंग बाबासाहेब के संघर्षों का प्रतीक है और इस पर उनका राजनीतिक ‘ट्रेडमार्क’ रजिस्टर्ड है। अखिलेश यादव जी को अपनी लाल टोपी और हरे झंडे तक ही सीमित रहना चाहिए। मायावती जी की मानें तो समाजवादियों द्वारा नीले रंग को छूना भी ‘वैचारिक डकैती’ के समान है। अब बेचारे वोटर असमंजस में हैं कि वे मतदान केंद्र पर वोट देने जाएं या नेताओं के कपड़ों की मैचिंग देखने!

काक-वाणी की अंतिम सलाह

इस पूरे ड्रामे पर ‘काक-वाणी’ का कौआ यही कांव-कांव कर रहा है कि यूपी की जनता चाहे बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस जाए, लेकिन नेताओं के होर्डिंग्स का रंग फीका नहीं पड़ना चाहिए। जनता को भी चाहिए कि वे अब विकास और रोजगार की फालतू बातें छोड़ें और अपने घरों के बाहर पेंट की दुकान खोल लें। आखिर कौन सा नेता कब किस रंग को अपना पेटेंट घोषित कर दे, यह तो सिर्फ चुनावी मौसम विभाग ही बता सकता है। वैसे, लाल और नीले के इस मिलावट से जो बैंगनी रंग बनेगा, क्या पता अगली सरकार उसी रंग की बन जाए!


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कागा जी