नमस्कार देवियों और सज्जनों! स्वागत है आपका ‘काक-वाणी’ के विशेष खंड ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ में। आज हम आपके लिए लेकर आए हैं ज्ञान का वह महासागर, जिसकी लहरें सुबह-सुबह आपके फोन की घंटी बजाती हैं और ‘गुड मॉर्निंग’ के साथ ‘यह मैसेज 11 लोगों को भेजें, शाम तक शुभ समाचार मिलेगा’ का ईश्वरीय वरदान देती हैं। आइए, आज कुछ ऐसे ही ऐतिहासिक और वैज्ञानिक दावों की कड़वी सच्चाई का फैक्ट चेक करते हैं, जिन्होंने विज्ञान और इतिहास की गरिमा को तार-तार कर दिया है।
यूनेस्को का ‘राष्ट्रगान’ वाला सदाबहार झूठ
सबसे पहले बात करते हैं उस क्लासिक दावे की, जो हर स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर कब्र से बाहर निकल आता है। दावा है कि “यूनेस्को ने भारत के राष्ट्रगान को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रगान घोषित किया है।” गनीमत है कि यूनेस्को के पास इस वायरल मैसेज का खंडन करने के लिए अलग से कोई विभाग नहीं है, वरना उनके अधिकारी अब तक इस्तीफा देकर संन्यास ले चुके होते। सच तो यह है कि यूनेस्को ऐसी कोई प्रतियोगिता या लिस्ट आयोजित ही नहीं करता। लेकिन हमारे पारिवारिक ग्रुप के ‘फूफा जी’ इस दावे को सच साबित करने के लिए यूनेस्को के मुख्यालय में धरना देने को भी तैयार हैं।
नासा के वैज्ञानिकों का ‘ॐ’ कनेक्शन
दूसरा सबसे लोकप्रिय दावा है कि नासा ने सूरज से निकलने वाली आवाज़ को रिकॉर्ड किया है, और वह आवाज़ हूबहू ‘ॐ’ जैसी है। बेशक, नासा के वैज्ञानिक अपनी दूरबीनें और उपग्रह छोड़कर सुबह-सुबह प्राणायाम करते हैं और व्हाट्सएप पर ज्ञान बांटते हैं। वैसे तो बुनियादी विज्ञान कहता है कि अंतरिक्ष में वैक्यूम (शून्य) होने के कारण ध्वनि तरंगें यात्रा नहीं कर सकतीं, लेकिन हमारे व्हाट्सएप के ‘महान वैज्ञानिकों’ के लिए भौतिकी के नियम कोई मायने नहीं रखते। उनके लिए तो विज्ञान वही है जो उनके फोन की स्क्रीन पर फॉरवर्डेड लेबल के साथ आता है।
इलायची, नींबू और लहसुन से अमरत्व का नुस्खा
अब आते हैं मेडिकल साइंस के सबसे बड़े मसीहाओं पर। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के डॉक्टरों के अनुसार, अगर आप सुबह खाली पेट लहसुन की तीन कलियां और गर्म पानी पी लें, तो कैंसर जैसी गंभीर बीमारी भी दुम दबाकर भाग जाएगी। इन मैसेजेस में गंभीर बीमारियों का इलाज ऐसे चुटकियों में बताया जाता है जैसे कोई दो मिनट में मैगी बनाने की रेसिपी हो। असलियत यह है कि इस नुस्खे से सिर्फ पेट की गैस और मुंह की बदबू ही दूर हो सकती है, लेकिन लोग बिना किसी डॉक्टर की सलाह के इसे संजीवनी बूटी मानकर अंधाधुंध फॉरवर्ड करते रहते हैं।
सच्चाई की कड़वी घूंट: उंगलियों को दें आराम
तो प्रिय पाठकों, अगली बार जब आपके पास ‘नासा की लेटेस्ट रिसर्च’ या ‘यूनेस्को का नया सर्टिफिकेट’ वाला कोई सनसनीखेज मैसेज आए, तो अपनी उंगलियों को थोड़ा आराम दें। हर पीले बैकग्राउंड वाले ज्ञान को सच मानने से बेहतर है कि आप गूगल बाबा की शरण में जाएं और फैक्ट चेक करें। वरना, बिना सोचे-समझे फॉरवर्ड किया गया एक मैसेज आपको समाज में ‘परम ज्ञानी’ तो नहीं, लेकिन ‘फर्जी खबरची’ जरूर साबित कर देगा!