थ्योरी ऑफ ‘जुड़वां भाई’: जब बुद्धिजीवियों को पता चला कि ढाका और इस्लामाबाद में फर्क है!

अरे भाई, ढोल-नगाड़े बजाओ और लुटियंस दिल्ली में बूंदी के लड्डू बंटवाओ! एक ऐसा ‘ब्रह्मांडीय ज्ञान’ प्रकट हुआ है, जिसे सुनकर साक्षात चाणक्य भी अपनी समाधि से उठ खड़े होंगे। हमारे देश के परम ज्ञानी रक्षा विश्लेषकों को अचानक यह दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ है कि बांग्लादेश और पाकिस्तान दोनों अलग-अलग देश हैं! जी हां, द प्रिंट के हमारे बौद्धिक वीरों ने यह महान खोज की है कि दोनों को एक ही चश्मे से देखना भारत के रणनीतिक हितों को नुकसान पहुंचाता है। इतनी भारी खोज के लिए लेखक को तुरंत नोबेल न सही, तो कम से कम किसी सरकारी कमेटी की सदस्यता तो मिल ही जानी चाहिए।

क्या बात है! दोनों का भूगोल और इतिहास अलग है?

अब तक तो हमारे टीवी चैनलों के परम राष्ट्रभक्त एंकरों और सोशल मीडिया के स्वयंभू जनरलों को यही लगता था कि सीमा पार जो भी है, वह सब पाकिस्तान ही है। हमारे चुनावी भाषणों में भी तो दोनों को एक ही थैली का चट्टा-बट्टा बताया जाता था। लेकिन हमारे थिंक-टैंक के चश्मे से देखिए, उन्हें अचानक याद आया कि अरे, बांग्लादेश तो बंगाली संस्कृति और भाषा के गौरव से पैदा हुआ था, जबकि पाकिस्तान केवल नफरत की बुनियाद पर। यह अद्भुत सत्य समझने में हमें केवल 53 साल लगे! धन्य है हमारी रणनीतिक दूरदर्शिता और धन्य हैं हमारे नीति निर्माता!

बिना ‘हाइफन’ के टीवी डिबेट और चुनावी रैलियां कैसे चलेंगी?

अब असली चिंता यह है कि अगर हमने बांग्लादेश और पाकिस्तान को एक साथ जोड़ना बंद कर दिया, तो शाम सात बजे के टीवी दंगल का क्या होगा? हमारे राजनेता रैलियों में ‘घुसपैठियों’ और ‘पाकिस्तानी एजेंटों’ को एक ही सांस में कैसे लपेटेंगे? अगर दोनों अलग हैं, तो हमारी घरेलू राजनीति के ध्रुवीकरण वाले फॉर्मूले में तो गड़बड़ हो जाएगी। रणनीतिकारों का कहना है कि बांग्लादेश को पाकिस्तान समझने की भूल से ढाका हमसे दूर छिटक रहा है। वाह! यानी अब तक हम पड़ोसियों को केवल अपनी घरेलू राजनीति के फायदे के लिए इस्तेमाल कर रहे थे और उम्मीद कर रहे थे कि वे हमारे लिए रेड कार्पेट बिछाए रखेंगे।

पड़ोसी नीति या कागजी घोड़े?

हमारी विदेश नीति का सबसे बड़ा चमत्कार यही है कि हम पहले संकट को अपने घर के दरवाजे तक आने देते हैं, और फिर उस पर ढाई हजार शब्दों का गंभीर विश्लेषण लिखते हैं। जब ढाका में आग लगी थी, तब हमारे चाणक्य गहरी नींद में थे। अब जब वहां की हवा बदल गई है, तो हमें याद आ रहा है कि ‘अरे भाई, बांग्लादेश तो पाकिस्तान का आईना नहीं है!’ सचमुच, ‘काक-वाणी’ तो बस यही कहेगी कि जब तक हमारे नीति निर्माता वातानुकूलित कमरों में बैठकर ऐसी महान खोजें करते रहेंगे, तब तक हमारे पड़ोसी देश चीन की गोद में बैठकर हमारी रणनीतिक गहराई को नापते रहेंगे।


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कागा जी