टूटी घड़ी और उम्मीद की नई सुई

एक उदास शाम और ठहर गया वक्त

रामू काका शहर के एक बेहद पुराने और तंग कोने में घड़ियों की मरम्मत का काम करते थे। उनके लिए घड़ियां सिर्फ समय बताने का जरिया नहीं थीं, बल्कि वे हर घड़ी की टिक-टिक में जीवन की धड़कन सुनते थे। लेकिन पिछले दो सालों से रामू काका के खुद के जीवन की धड़कन जैसे थम सी गई थी। उनके इकलौते जवान बेटे की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी, जिसके बाद उनकी पत्नी भी सदमे में चल बसीं। तब से रामू काका ने मुस्कुराना छोड़ दिया था।

उनकी दुकान में रखी सैकड़ों घड़ियाँ दिन-रात टिक-टिक करती थीं, पर रामू काका का वक्त जैसे एक ही जगह जम गया था। वे अक्सर दुकान के शून्य में ताकते रहते और सोचते कि जब जीवन में कोई अपना ही नहीं बचा, तो इस जिंदगी को आगे खींचने का क्या मतलब है?

एक नन्ही परी और टूटी हुई गुड़िया

एक शाम, जब बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी और रामू काका दुकान बढ़ाने की सोच रहे थे, तभी दरवाजे पर लगी घंटी बजी। एक छोटी सी आठ साल की बच्ची, जो पूरी तरह भीग चुकी थी, अंदर आई। उसके हाथों में कपड़े की एक पुरानी, फटी हुई गुड़िया थी, जिसके पीछे चाबी घुमाने वाला एक छोटा सा यंत्र लगा था।

बच्ची ने रोते हुए अपनी मासूम आवाज में कहा, “दादाजी, मेरी माँ ने स्वर्ग जाने से पहले मुझे यह गुड़िया दी थी। जब मैं इसकी चाबी घुमाती थी, तो इसमें से एक सुंदर लोरी बजती थी। लेकिन अब यह पूरी तरह चुप हो गई है। क्या आप इसे ठीक कर सकते हैं? मुझे बहुत डर लगता है।”

रामू काका ने ठंडी सांस ली और कहा, “बेटा, मैं सिर्फ घड़ियां ठीक करता हूँ, खिलौने नहीं। तुम इसे किसी खिलौने वाले के पास ले जाओ।”

बच्ची की आँखों से आंसू बह निकले, उसने कहा, “मैं तीन खिलौने वालों के पास गई थी, उन्होंने कहा कि इसके अंदर घड़ी का ही कोई पुर्जा लगा है जो अब बाजार में नहीं मिलता। दादाजी, प्लीज इसे ठीक कर दीजिए, इसके बिना मुझे माँ की आवाज सुनाई नहीं देती।” बच्ची का यह दर्द रामू काका के कलेजे को चीर गया। उन्हें अपनी सूनी जिंदगी और उस बच्ची का अकेलापन एक जैसा लगा।

जब धड़क उठा थम चुका समय

कांपते हाथों से रामू काका ने गुड़िया को अपने हाथ में लिया। उन्होंने जब उसका यंत्र खोला, तो देखा कि उसके अंदर का मुख्य स्प्रिंग टूट चुका था। वह पुर्जा वाकई बहुत दुर्लभ था। रामू काका कुछ देर सोचते रहे, फिर उन्होंने अपनी जेब से सोने की वह घड़ी निकाली जो उनके बेटे की आखिरी निशानी थी। उन्होंने बिना पलक झपकाए उस बेशकीमती घड़ी को खोला और उसका मुख्य स्प्रिंग निकालकर उस बच्ची की गुड़िया में फिट कर दिया।

जैसे ही उन्होंने गुड़िया की चाबी घुमाई, दुकान के सन्नाटे को चीरता हुआ एक बेहद सुरीला संगीत गूंज उठा। बच्ची का चेहरा खुशी से चमक उठा। उसने उछलकर रामू काका को गले लगा लिया और कहा, “थैंक यू दादाजी! आपने मेरी माँ को वापस बुला लिया।”

बच्ची की उस जादुई मुस्कान और उसके गले लगाने के अहसास ने रामू काका के भीतर जमी दो साल पुरानी बर्फ को पिघला दिया। उनकी आँखों से आंसुओं का सैलाब बह निकला, लेकिन यह आंसू दुख के नहीं, बल्कि आत्मिक शांति के थे। उन्हें समझ आ गया कि उनके बेटे की यादें उस बंद घड़ी में नहीं, बल्कि किसी को खुशी देने में जीवित रहेंगी।

कहानी से सीख

सीख: इस कहानी से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि जीवन में दुख और खालीपन चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, खुद को समेटकर दूसरों की मदद के लिए आगे बढ़ना ही असली जीवन है। जब हम दूसरों की जिंदगी में खुशियों का रंग भरते हैं, तो हमारा अपना रुका हुआ समय भी मुस्कुराने लगता है।

कागा जी