बॉलीवुड में जब भी शानदार कहानियों और यादगार किरदारों की बात होती है, तो हमारे दिमाग में दो अलग-अलग तस्वीरें उभरती हैं। एक तरफ स्विट्जरलैंड की हसीन वादियों में हवा में उड़ती पीली शिफॉन साड़ी, तो दूसरी तरफ एक छोटे से घर के ड्रॉइंग रूम में बैठकर शतरंज खेलता और चाय की चुस्की लेता एक आम परिवार। ये दो अलग-अलग दुनिया रचने वाले सिनेमाई जादूगर थे – यश चोपड़ा और ऋषिकेश मुखर्जी। हाल ही में ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने इस बात पर मुहर लगाई है कि कैसे इन दोनों दिग्गजों ने मिलकर हिंदी सिनेमा को परिभाषित किया। आइए, ‘काक-वाणी’ के इस खास बुलेटिन में टटोलते हैं इनकी जादुई विरासत को!
एक तरफ स्विस वादियां, तो दूसरी तरफ मिडल-क्लास का सोफा!
यश चोपड़ा यानी रोमांस के वो बेताज बादशाह, जिन्होंने हमें सिखाया कि प्यार कैसे किया जाता है। उन्होंने हमें ‘दीवार’ का एंग्री यंग मैन भी दिया और ‘चांदनी’ व ‘दिल तो पागल है’ का खूबसूरत अहसास भी। यश जी की फिल्मों में प्यार सिर्फ एक भावना नहीं, बल्कि एक भव्य त्योहार था। बड़े-बड़े सेट, लाजवाब संगीत और दिल को छू लेने वाली शायरी उनकी फिल्मों की जान हुआ करती थी।
वहीं दूसरी तरफ थे हमारे प्यारे ‘ऋषि दा’ यानी ऋषिकेश मुखर्जी। ऋषि दा ने बड़े-बड़े सुपरस्टार्स को उनके ‘स्टारडम’ के भारी-भरकम चोगे से बाहर निकाला और उन्हें हमारे पड़ोस का लड़का बना दिया। उन्होंने अमिताभ बच्चन को ‘आनंद’ का गंभीर ‘बाबू मोशाय’ बनाया, तो ‘गोलमाल’ में अमोल पालेकर की सादगी से हमें लोटपोट होने पर मजबूर कर दिया। ऋषि दा की फिल्मों में कोई खूंखार विलेन नहीं होता था, वहां बस जिंदगी की प्यारी और खट्टी-मीठी उलझनें होती थीं।
जब सिनेमा बना सपनों और हकीकत का खूबसूरत संगम
जरा सोचिए, अगर हिंदी सिनेमा में सिर्फ यश चोपड़ा होते, तो हम शायद हकीकत से दूर सिर्फ ख्वाबों की हसीन दुनिया में ही खोए रहते। और अगर सिर्फ ऋषि दा होते, तो शायद सिनेमा में ग्लैमर का वो तड़का गायब हो जाता जो हमें हकीकत से थोड़ी देर के लिए दूर ले जाता है। इन दोनों निर्देशकों ने मिलकर दर्शकों को सिनेमा की एक परफेक्ट ‘बैलेंस डाइट’ दी। यश चोपड़ा ने हमें वो सपने दिखाए जो हम देखना चाहते थे, और ऋषिकेश मुखर्जी ने हमें वो आइना दिखाया जिसमें हम खुद को देख सकते थे।
काक-वाणी की खरी बात
आज के दौर में जब वीएफएक्स (VFX), एक्शन और मारधाड़ के शोर में कहानियां कहीं खो गई हैं, तब यश चोपड़ा और ऋषि दा की फिल्में एक ठंडी हवा के झोंके जैसी लगती हैं। इन दोनों महागुरुओं ने साबित किया कि सिनेमा चाहे करोड़ों के बजट का हो या फिर एक कमरे का, अगर कहानी में ‘दिल’ और ‘जज्बात’ हैं, तो वह हमेशा के लिए अमर हो जाती है। बॉलीवुड के इन दो खंभों को हमारा कड़क सलाम!
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