माटी का दीया और सोने की जंजीर: जीवन का असली सच

बहुत समय पहले की बात है, एक समृद्ध राज्य में धर्मपाल नाम का एक बेहद अमीर सेठ रहता था। उसके पास धन, दौलत और आलीशान महल सब कुछ था, लेकिन उसके मन में कभी शांति नहीं थी। वह हमेशा और अधिक पाने की लालसा में डूबा रहता था। उसी नगर के बाहरी हिस्से में रामू नाम का एक गरीब लकड़हारा अपनी छोटी सी झोपड़ी में रहता था। रामू दिनभर सूखी लकड़ियां काटता, उन्हें बेचता और जो कुछ भी मिलता, उसमें अपने परिवार के साथ हंसते-खेलते समय बिताता।

एक अमीर सेठ और संतोषी लकड़हारा

सेठ धर्मपाल अक्सर सोचता था कि मेरे पास इतना सब कुछ है, फिर भी मैं रात को चैन से सो नहीं पाता। दूसरी ओर, यह लकड़हारा सूखी रोटी खाकर भी इतनी गहरी नींद कैसे सो लेता है? अपनी इसी व्याकुलता को दूर करने के लिए सेठ धर्मपाल ने नगर के बाहर कुटिया में रहने वाले एक सिद्ध महात्मा के पास जाने का फैसला किया।

महात्मा की अनोखी परीक्षा

सेठ महात्मा जी के पास पहुंचा और आदरपूर्वक प्रणाम करके अपनी समस्या बताई। महात्मा जी मुस्कुराए और बोले, “सेठ जी, आपके प्रश्न का उत्तर कल सुबह मिलेगा। आज रात तुम और रामू लकड़हारा, दोनों मेरी कुटिया में ही ठहरेंगे।”

महात्मा जी ने दोनों को सोने के लिए एक-एक कमरा दिया। आधी रात को महात्मा जी ने सेठ के कमरे में सोने की एक भारी जंजीर रख दी और रामू के कमरे में मिट्टी का एक जलता हुआ दीया रख दिया। कुछ देर बाद महात्मा जी ने सेठ के कमरे की खिड़की से झांका। सेठ सोने की जंजीर को हाथ में लेकर उसकी चमक को देख रहा था और हिसाब लगा रहा था कि इसकी कीमत क्या होगी और इसे कहां छुपाया जाए। वह पूरी रात सो नहीं पाया।

जब महात्मा जी ने रामू के कमरे में देखा, तो रामू उस माटी के दीए की मद्धम रोशनी में शांत मन से गहरी नींद सो रहा था। उसे इस बात की कोई चिंता नहीं थी कि दीया बुझ जाएगा या कोई उसे चुरा लेगा।

जीवन का अंतिम सत्य

सुबह होते ही महात्मा जी ने दोनों को अपने पास बुलाया। उन्होंने सेठ धर्मपाल से पूछा, “सेठ जी, रात कैसी बीती?” सेठ ने थकी हुई आँखों से कहा, “महाराज, मैं रातभर उस सोने की जंजीर की सुरक्षा और उसकी कीमत के बारे में सोचता रहा। मुझे एक पल भी नींद नहीं आई।”

फिर महात्मा जी ने रामू से पूछा। रामू ने मुस्कुराकर कहा, “महाराज, मैं तो बहुत गहरी नींद सोया। उस माटी के दीए ने मुझे अंधेरे से बचाया और मैंने बिना किसी डर के चैन की नींद ली।”

महात्मा जी ने सेठ की ओर देखा और कहा, “यही जीवन का सच है। तुम सोने की जंजीर यानी अपनी असीमित इच्छाओं और माया के जाल में बंधे हो, जो तुम्हें कभी शांत नहीं रहने देती। वहीं रामू मिट्टी के दीए की तरह अपनी बुनियादी जरूरतों में ही खुश है। जीवन का सच भौतिक वस्तुओं को इकट्ठा करने में नहीं, बल्कि संतोष में है।” सेठ धर्मपाल को अपने जीवन की सबसे बड़ी सीख मिल चुकी थी।

कहानी की सीख

सीख: इस लोककथा से हमें यह सीख मिलती है कि बाहरी चमक-दमक और अत्यधिक धन-दौलत कभी मन को शांति नहीं दे सकती। जीवन का असली सुख और सत्य संतोष (Contentment) में छिपा है। जब तक हमारे भीतर संतोष नहीं होगा, तब तक हम चाहे जितने अमीर हो जाएं, अशांत ही रहेंगे।

कागा जी