कश्मीर को ‘एस्थेटिक’ क्रांति सिखाएगा भारत का जेन-जी (Gen Z): काक-वाणी का विशेष विश्लेषण

वाह! क्या अद्भुत विचार है! अंतरराष्ट्रीय मामलों की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘द डिप्लोमैट’ के वातानुकूलित दफ्तर में बैठकर किसी परम ज्ञानी ने यह अद्भुत थीसिस लिखी है— “क्या कश्मीर भारत के जेन-जी (Gen-Z) आंदोलन से कुछ सीख सकता है?” सचमुच, इस लेख को पढ़कर हमारी आंखों से ज्ञान के आंसू छलक पड़े। अब तक जो गुत्थी संयुक्त राष्ट्र, सेना, राजनेता और कूटनीतिज्ञ सत्तर साल में नहीं सुलझा पाए, उसका समाधान अब दिल्ली और मुंबई के वातानुकूलित कैफे में बैठकर ‘स्टारबक्स की कॉफी’ की चुस्कियों के साथ खोजा जाएगा।

कैनवा के पास्टेल रंग और कश्मीर की वादी

कश्मीर के नौजवानों, जरा ध्यान से सुनो! तुम अब तक इतिहास, भूगोल, स्वायत्तता और सीमाओं के गंभीर राजनीतिक चक्करों में क्यों पड़े हो? तुम्हें तो दिल्ली और बेंगलुरु के जेन-जी (Gen-Z) से ‘एस्थेटिक क्रांति’ सीखनी चाहिए। इस लेख के पीछे छिपे बुद्धिजीवी चाहते हैं कि कश्मीर के युवा अपनी मुश्किलों को हल करने के लिए बंदूकें या पत्थर नहीं, बल्कि स्मार्टफ़ोन उठाएं। वे पास्टेल-बैकग्राउंड वाले सुंदर कैनवा पोस्ट बनाएं और उस पर लिखें— ‘कश्मीर वाइब्स आर नॉट मैचिंग विद द सिस्टम, ब्रो!’ आखिर, जब तक आपके विरोध प्रदर्शन का फॉन्ट और कलर स्कीम ट्रेंडी न हो, तब तक आपकी बात सुनी ही क्यों जानी चाहिए?

हमारे देश के लिबरल एक्टिविस्ट और ‘ट्विटर वॉरियर्स’ ने यह साबित कर दिया है कि असली लड़ाई कूटनीति या धरातल पर काम करने से नहीं, बल्कि ‘कैंसल कल्चर’ और इंस्टाग्राम स्टोरीज से जीती जाती है। कश्मीर में इंटरनेट बंद होने की पुरानी समस्या का हल भी शायद इसी थ्योरी में छुपा है। लेकिन जब इंटरनेट ही नहीं होगा, तो जेन-जी का आंदोलन कैसे चलेगा? खैर, ऐसी छोटी-मोटी तकनीकी बारीकियो पर ध्यान देकर विदेशी मैग्जीन के लेखकों की ‘क्रिएटिविटी’ को ठेस नहीं पहुंचाई जानी चाहिए।

हैशटैग और रील्स से बदलेगा भूगोल

इस महान थ्योरी के अनुसार, कश्मीर के युवाओं को अब राजनीतिक बहसों को छोड़कर रील्स बनानी चाहिए। ‘मोये-मोये’ वाले ट्रेंड पर कश्मीर की जटिल समस्याओं को बयां करना चाहिए। वैसे भी, हमारे देश के कुछ कथित युवा नेता इसी जेन-जी ब्रांड की राजनीति के सहारे देश बदलने का सपना देख रहे हैं। उन्हें लगता है कि संसद में गंभीर नीतिगत बहस करने से कहीं ज्यादा जरूरी है कि ट्विटर पर कोई फनी मीम शेयर कर दिया जाए।

काक-वाणी का सीधा सा मानना है कि जब तक दुनिया में ऐसे ज्ञानी बुद्धिजीवी मौजूद हैं, जो कूटनीति को टिकटॉक वीडियो की तरह आसान समझते हैं, तब तक दुनिया की हर समस्या का समाधान मुमकिन है। बस जरूरत है तो एक अच्छे वाई-फाई कनेक्शन की, थोड़े से ‘वोक’ एटीट्यूड की और वास्तविकता से पूरी तरह कटे होने की!


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कागा जी