‘दिल’ गायब, ‘कैलकुलेटर’ चालू! क्यों अब स्प्रेडशीट से बन रही हैं बॉलीवुड फिल्में?

आजकल जब आप थियेटर में पॉपकॉर्न का डिब्बा लेकर बैठते हैं, तो दिल में उत्साह कम और दिमाग में यह शंका ज्यादा होती है कि क्या यह फिल्म सचमुच देखने लायक होगी? वो रूह, वो जज्बात, और वो पागलपन जो कभी भारतीय सिनेमा की पहचान हुआ करता था, अब गायब सा हो गया है। हाल ही में मेंसएक्सपी (MensXP) के एक आर्टिकल ने इंटरनेट पर एक नई बहस छेड़ दी है, जिसका सीधा सा मतलब है—”काश! हमारे फिल्ममेकर्स फिल्में दिल के जुनून से बनाते, न कि एक्सेल शीट देखकर।”

जब कहानी नहीं, डेटा तय करता है फिल्म का बजट!

वो भी क्या दिन थे जब गुरु दत्त, राज कपूर या यश चोपड़ा जैसे दिग्गज अपनी आत्मा को पर्दे पर उतारने के लिए पूरी संपत्ति दांव पर लगा देते थे। ‘मुग़ल-ए-आज़म’ बनाने के लिए के. आसिफ ने सालों का वक्त लिया, क्योंकि उनके सिर पर सिर्फ एक बेहतरीन सिनेमा बनाने का भूत सवार था। लेकिन आज के दौर में Bollywood Movies का गणित पूरी तरह बदल चुका है। अब फिल्म की शुरुआत किसी लेखक के दिल से नहीं, बल्कि कॉर्पोरेट बोर्डरूम की एक्सेल शीट से होती है। वहां तय किया जाता है कि किस स्टार की सोशल मीडिया रीच कितनी है, किस गाने पर ज्यादा रील्स बनेंगी और किस ओटीटी प्लेटफॉर्म से कितना एडवांस मिलेगा।

प्रोजेक्ट असेंबलिंग बनाम असली सिनेमा

आजकल फिल्में ‘बनाई’ नहीं जातीं, बल्कि ‘असेंबल’ की जाती हैं। मेकर्स के पास अब जुनून की जगह एल्गोरिदम का चश्मा है। उन्हें लगता है कि भारी-भरकम वीएफएक्स (VFX), चार रीमेक गाने और सोशल मीडिया पर करोड़ों फॉलोअर्स वाले स्टार्स को मिला देने से एक ब्लॉकबस्टर फिल्म तैयार हो जाएगी। लेकिन नतीजा क्या निकल रहा है? बिना आत्मा की बेजान फिल्में, जिन्हें दर्शक पहले ही हफ्ते में नकार देते हैं। दर्शक अब स्क्रीन पर भव्यता तो देख रहे हैं, लेकिन उस जुड़ाव (connection) को तरस रहे हैं जो कभी सिनेमा की ताकत हुआ करता था।

काक-वाणी की खरी-खरी: कॉर्पोरेट चंगुल से बाहर निकलो मेकर्स!

‘काक-वाणी’ का साफ मानना है कि जब तक फिल्मों से यह जरूरत से ज्यादा कॉर्पोरेट हस्तक्षेप खत्म नहीं होगा, तब तक हमें क्लासिक फिल्में देखने को नहीं मिलेंगी। स्प्रेडशीट से आप कुछ समय का मुनाफा तो कमा सकते हैं, लेकिन दर्शकों के दिलों में हमेशा के लिए जगह नहीं बना सकते। अब समय आ गया है कि हमारे फिल्ममेकर्स अपने लैपटॉप की एक्सेल शीट को बंद करें, अपने भीतर के कलाकार को जगाएं, और फिल्मों में उस ‘जुनून’ को वापस लाएं जो कभी हमारी पहचान था!


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कागा जी