जिन्ना की आत्मा और इकबाल का तराना: शरजील इमाम की ‘भूतकाल’ एक्सप्रेस

वाह! क्या गजब की बात है। जब पूरी दुनिया चैटजीपीटी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मंगल ग्रह पर जमीन खरीदने की जुगत भिड़ा रही है, हमारे देश के कुछ स्वघोषित क्रांतिकारी युवा आज भी टाइम मशीन में बैठकर सीधे १९४७ के विभाजन वाले स्टेशन पर उतर रहे हैं। ‘द प्रिंट’ के एक लेख ने हमारी आंखें खोल दीं, जिसमें बताया गया है कि शरजील इमाम की राजनीति आज भी जिन्ना, इकबाल और विभाजन के इर्द-गिर्द ही रेंग रही है। इसे कहते हैं ‘विंटेज पॉलिटिक्स’ का असली और क्लासिक शौक!

इतिहास की धूल और २१वीं सदी की ‘क्रांति’

आमतौर पर युवा भविष्य की बात करते हैं, नौकरियों और तकनीक की बात करते हैं, लेकिन हमारे शरजील बाबू का मानना है कि जब तक इतिहास के गड़े मुर्दे उखाड़कर उनका डीएनए टेस्ट न कर लिया जाए, तब तक क्रांति अधूरी है। मोहम्मद अली जिन्ना साहब तो कब के चले गए (और जो कुछ छोड़ गए, उसकी हालत पड़ोसी मुल्क में सब देख ही रहे हैं), लेकिन उनकी वैचारिक आत्मा आज भी हमारे कुछ ‘अति-बौद्धिक’ युवाओं के कमरों में चाय की चुस्कियों के साथ जिंदा है। शरजील भाई को लगता है कि आज के भारत की समस्याओं का समाधान १९४७ के उन धूल धूसरित भाषणों में है, जिन्हें खुद इतिहास भी भूलना चाहता है।

इकबाल का तराना और टाइम मशीन का सफर

अल्लामा इकबाल ने कभी लिखा था, ‘सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’, फिर अचानक उन्हें लगा कि नहीं, थोड़ा सा हिस्सा अलग ही कर लेते हैं। शरजील इमाम की राजनीति इसी भ्रम जाल में फंसी हुई है। वे एक ऐसे आधुनिक हकीम की तरह हैं जो मरीज के सिरदर्द का इलाज यह कहकर करते हैं कि ‘तुम्हारे परदादा को भी १९४७ में सिरदर्द हुआ था, इसलिए पहले जिन्ना का पर्चा पढ़ो।’ अरे भाई, आज के युवाओं को रोजगार, शिक्षा और तरक्की चाहिए, लेकिन इन्हें आज भी असम को भारत से काटने के ख्याली पुलाव पकाने में ही असली ‘एक्टिविज्म’ नजर आता है।

काक-वाणी का कड़वा सच

‘काक-वाणी’ का स्पष्ट मानना है कि जिन्ना और इकबाल को इतिहास के पन्नों में ही दफन रहने दिया जाए तो देश का भला होगा। उन्हें आज के दौर में जबरन ‘रिबूट’ करने की कोशिश वैसी ही है, जैसे ५जी के जमाने में नोकिया ११०० में पबजी (PUBG) चलाने की नाकाम कोशिश करना। शरजील इमाम की राजनीति अतीत के उस दलदल में धंस चुकी है, जहां से सिर्फ नफरत और विभाजन की बदबू आती है। काश, कोई इन नौजवानों को समझाए कि देश बहुत आगे निकल चुका है, और जो लोग आज भी १९४७ के टाइम लूप में फंसे हैं, वे सिर्फ इतिहास के मलबे में ही पाए जाएंगे, भविष्य की किताबों में नहीं।


संदर्भ मुख्य समाचार: यहाँ देखें

कागा जी