सच्चा धन: जीवन का कड़वा सच बताने वाली एक लोककथा

माया का जाल और एक अमीर सेठ

बहुत समय पहले की बात है, एक समृद्ध नगर में धर्मपाल नाम का एक बेहद अमीर सेठ रहता था। उसके पास धन, दौलत, आलीशान महल और नौकर-चाकर, सब कुछ था। लेकिन इस असीम संपत्ति के बाद भी उसके मन में केवल एक ही चिंता रहती थी—अपने धन को और कैसे बढ़ाया जाए। वह रात-दिन सिर्फ पैसों के पीछे भागता रहता था। उसने गरीबों का शोषण किया, व्यापार में बेईमानी की, और बस अपनी तिजोरियां भरता गया। उसका मानना था कि पैसा ही जीवन का सबसे बड़ा सच है और इसी से हर सुख खरीदा जा सकता है।

एक फकीर की अजीब मांग

एक दिन, उस नगर में एक पहुंचे हुए फकीर बाबा आए। उनकी ख्याति सुनकर सेठ धर्मपाल भी अपनी अमीरी का दिखावा करने उनके पास पहुंचा। सेठ ने फकीर के चरणों में सोने के सिक्कों से भरी थाली रखी और घमंड से कहा, “बाबा, मैं इस नगर का सबसे अमीर व्यक्ति हूँ। मुझे आशीर्वाद दें कि मेरा यह खजाना कभी खाली न हो।”

फकीर बाबा मुस्कुराए। उन्होंने सोने के सिक्कों को छुआ तक नहीं। उन्होंने अपनी झोली से एक सूखी लकड़ी का टुकड़ा और थोड़ी सी राख निकाली और सेठ को देते हुए कहा, “सेठ जी, मुझे आपके सोने की जरूरत नहीं है। बस मेरी एक छोटी सी प्रार्थना स्वीकार करें। जब आपकी मृत्यु हो जाए और आप परलोक जाएं, तो यह राख और लकड़ी का टुकड़ा मेरे पास पहुंचा दीजिएगा। मैं वहां आपका इंतजार करूँगा।”

खुल गईं सेठ की आंखें

यह सुनकर सेठ धर्मपाल हैरान रह गया। वह जोर से हँसा और बोला, “बाबा! आप कैसी अजीब बातें कर रहे हैं? मृत्यु के बाद तो इंसान का शरीर भी यहीं मिट्टी में मिल जाता है। कोई भी व्यक्ति मृत्यु के बाद सुई की एक नोक बराबर चीज भी अपने साथ नहीं ले जा सकता। फिर मैं यह लकड़ी और राख परलोक कैसे ले जाऊंगा?”

फकीर बाबा के चेहरे पर एक शांत और गंभीर मुस्कान तैर गई। उन्होंने सेठ की आँखों में देखते हुए बहुत ही कोमल आवाज में कहा, “हे सेठ! जब तुम जानते हो कि तुम मृत्यु के बाद इस तुच्छ राख को भी अपने साथ नहीं ले जा सकते, तो फिर जीवन भर पाप, बेईमानी और दूसरों का दिल दुखाकर जो धन इकट्ठा कर रहे हो, उसे साथ कैसे ले जाओगे? जब खाली हाथ आए थे और खाली हाथ ही जाना है, तो फिर इस माया के पीछे अपनी आत्मा को क्यों बेच रहे हो?”

फकीर की यह बात सीधे सेठ धर्मपाल के दिल पर लगी। उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने उसकी बंद आँखों से अज्ञानता का पर्दा हटा दिया हो। उसकी आँखों से पश्चाताप के आंसू बहने लगे। उसे समझ आ गया कि जीवन का असली सच धन संचय नहीं, बल्कि प्रेम, दया और सत्कर्म हैं। सेठ ने उसी क्षण अपना अहंकार त्याग दिया और अपनी संपत्ति का उपयोग गरीबों और जरूरतमंदों की सेवा में लगा दिया।

कहानी से सीख

सीख: यह जीवन का सच बताने वाली लोककथा हमें सिखाती है कि संसार की कोई भी भौतिक वस्तु स्थायी नहीं है। मौत के बाद इंसान के साथ केवल उसके द्वारा किए गए अच्छे कर्म ही जाते हैं। इसलिए, लोभ और अहंकार को त्यागकर परोपकार का मार्ग चुनना ही जीवन का असली उद्देश्य है।

कागा जी