‘अल जजीरा’ की दिव्य दृष्टि: भारत का असली राष्ट्रीय खेल ‘हॉकी’ नहीं, ‘धरना’ है!

नमस्कार दोस्तों! ‘काक-वाणी’ के इस विशेष अंक में आपका स्वागत है। हाल ही में कतर के प्रख्यात समाचार संस्थान ‘अल जजीरा’ को अचानक भारत पर अत्यंत प्रेम उमड़ आया है। उन्होंने एक गम्भीर शोध पत्र प्रस्तुत किया है, जिसका सार यह है कि भारत का निर्माण ईंट-गारे से नहीं, बल्कि धरनों और प्रदर्शनों की लाल मिट्टी से हुआ है। एंटी-हिंदी आंदोलन से लेकर किसान आंदोलन तक—अल जजीरा वालों ने इतनी बारीकी से हमारा इतिहास खंगाला है कि देश के पुराने इतिहासकार भी कोने में बैठकर रो रहे होंगे।

कतरी चश्मे से दिखता भारतीय लोकतंत्र

वाह! क्या विश्लेषणात्मक दृष्टि है! विदेशी मीडिया को लगता है कि भारत में सुबह की चाय के बाद और शाम के नाश्ते से पहले, हर नागरिक अपनी जेब में एक झंडा और बैनर लेकर घूमता है। तमिलनाडु में भाषा का विरोध हुआ, तो लगा लोकतंत्र सांस ले रहा है। दिल्ली के बॉर्डर पर टेंट गड़े, तो लगा कि भारत में क्रांति का नया सूरज उग गया है। अल जजीरा के अनुसार, अगर भारत में किसी दिन कोई सड़क जाम न हो, तो समझो देश की आत्मा ही सो गई है।

नेताओं की नीति: जब हम करें तो ‘क्रांति’, तुम करो तो ‘साजिश’

वैसे, इसमें हमारे विपक्षी दल और सत्ताधारियों का भी कम योगदान नहीं है। जब कोई दल सत्ता में बैठता है, तो हर आंदोलन के पीछे ‘विदेशी ताकतों’ और ‘अदृश्य षड्यंत्रकारियों’ का हाथ दिखाई देता है। लेकिन वही दल जब विपक्ष की कुर्सी पर विराजमान होता है, तो उन्हें हर सड़क पर लगने वाले जाम में ‘लोकतंत्र की खूबसूरती’ नजर आने लगती है। राजनीतिक दलों की यह दोहरी दृष्टि देखकर तो अल जजीरा वाले भी भ्रमित हो गए होंगे।

अगर इतिहास देखें, तो भारत में आंदोलनों का अपना ही एक अलग मज़ा है। पहले लोग अपनी मांगें मनवाने के लिए कड़ाके की धूप में भूख हड़ताल करते थे, और अब तो धरना स्थलों पर वाई-फाई, लंगर और मसाज कुर्सियों की सेवाएं उपलब्ध हो जाती हैं। यह लोकतंत्र का विकास नहीं तो और क्या है?

‘काक-वाणी’ का अंतिम ज्ञान

अंत में, ‘काक-वाणी’ अल जजीरा के विचारकों को यही मुफ़्त सलाह देगी कि वे भारत की इस ‘आंदोलनजीवी’ संस्कृति को समझने के लिए दोहा के वातानुकूलित स्टूडियो से बाहर निकलें। भारत में धरना सिर्फ एक विरोध प्रदर्शन नहीं है, यह एक सामाजिक उत्सव है जहाँ अदरक वाली चाय की चुस्कियों के साथ सरकारें बदलने के वादे किए जाते हैं। जब तक देश में तंबू, लाउडस्पीकर और मीडिया का कैमरा सलामत है, तब तक भारतीय लोकतंत्र को अल जजीरा के किसी सर्टिफिकेट की कतई जरूरत नहीं है!


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कागा जी