ममता की जीत और बीरबल की बुद्धिमानी

शहंशाह अकबर का दरबार सजा हुआ था। सभी दरबारी अपनी-अपनी बातें रख रहे थे, तभी दरबार में एक बूढ़ी औरत बदहवास हालत में रोती हुई दाखिल हुई। उसका नाम कांति देवी था। उसके चेहरे पर अपार दुख और आंखों में आंसुओं का समंदर था। उसकी इस हालत को देखकर दरबार में मौजूद सभी लोग हैरान रह गए।

एक असहाय दादी की पुकार

कांति देवी ने रोते हुए सम्राट अकबर से गुहार लगाई,
हुजूर! मेरी दुनिया लुट गई। मेरे बीमार पोते के इलाज के लिए मैंने सालों की मेहनत से कुछ सोने के सिक्के एक छोटी सी पोटली में जमा किए थे। आज सुबह जब मैं कुएं से पानी भरने गई, तो किसी ने मेरी वह पोटली चुरा ली। अगर मेरे बच्चे का इलाज नहीं हुआ, तो वह मर जाएगा! कृपया मेरी मदद कीजिए।

दरबार में सन्नाटा छा गया। कुछ दरबारियों ने इसे एक मामूली चोरी मानकर टालने की कोशिश की, लेकिन बीरबल ने उस वृद्ध महिला की आंखों में अपने पोते को खोने का गहरा खौफ देखा। बीरबल का हृदय उस बूढ़ी मां के दर्द से द्रवित हो उठा।

बीरबल का संवेदनशील कदम

बीरबल ने आगे बढ़कर उस रोती हुई वृद्धा के सिर पर हाथ रखा और कहा,
मां जी, आप घबराइए मत। शहंशाह अकबर के न्याय में देरी हो सकती है, लेकिन अंधेर नहीं। आपके पोते की सांसें भी बचेंगी और आपका धन भी वापस मिलेगा।

बीरबल ने बादशाह से अनुमति ली और उसी गांव के उन सभी दस संदिग्ध लोगों को दरबार में बुलवाया, जो सुबह कुएं के पास मौजूद थे।

जादुई मूर्ति का न्याय

बीरबल ने दरबार के पास वाले एक अंधेरे कमरे में एक लोहे की मूर्ति रखवा दी। उन्होंने उस मूर्ति पर गुप्त रूप से काले दिए की कालिख यानी काजल लगवा दिया था।

बीरबल ने सभी संदिग्धों से कहा,
इस अंधेरे कमरे में एक जादुई मूर्ति रखी है। जो इंसान सच्चा है, वह मूर्ति की पीठ पर हाथ रखकर बाहर आ जाए, मूर्ति उसे कुछ नहीं कहेगी। लेकिन जो चोर होगा, उसे मूर्ति अपनी शक्ति से तुरंत पहचान लेगी।

एक-एक करके सभी संदिग्ध उस अंधेरे कमरे में गए और थोड़ी देर में बाहर आ गए।

चोर की चालाकी और बीरबल का दिमाग

जब सभी बाहर आ गए, तो बीरबल ने उनसे अपने दोनों हाथ आगे करने को कहा। नौ लोगों के हाथ काले थे, क्योंकि उन्होंने निडर होकर मूर्ति को छुआ था। लेकिन एक व्यक्ति के हाथ बिल्कुल साफ थे। वह डर के मारे मूर्ति को बिना छुए ही बाहर आ गया था, ताकि जादुई मूर्ति उसे पकड़ न ले।

बीरबल ने मुस्कुराते हुए उसी व्यक्ति को पकड़ लिया और कहा,
जहाँपनाह! यही असली चोर है। इसके मन में पाप था, इसलिए इसने डर के मारे मूर्ति को छुआ ही नहीं।

इंसाफ और ममता का संगम

चोर डर गया और उसने तुरंत कांति देवी की पोटली लौटा दी। बीरबल की इस बुद्धिमत्ता से प्रभावित होकर सम्राट अकबर ने चोर को कड़ा दंड दिया और कांति देवी को शाही खजाने से १०० सोने के सिक्के अतिरिक्त इनाम में दिए।

बूढ़ी दादी की आंखों में अब दुख के नहीं, बल्कि कृतज्ञता के आंसू थे। उन्होंने बीरबल को गले से लगा लिया और ढेर सारी दुआएं दीं। बीरबल की चतुरता ने न केवल एक अपराध का पर्दाफाश किया, बल्कि एक निर्दोष बच्चे की जान भी बचा ली।

कहानी से सीख

नैतिक शिक्षा: सच्चा न्याय केवल कानून से नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और तीक्ष्ण बुद्धि से मिलता है। इसके अलावा, गलत काम करने वाला इंसान अपने ही डर के जाल में फंस जाता है, क्योंकि पाप कभी छुप नहीं सकता।

कागा जी