लोकतंत्र का ‘पोस्ट-ट्रुथ’ ड्रामा: हार का ठीकरा और अविश्वास की नई फैक्ट्री!

टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक बहुत ही भारी-भरकम अंग्रेजी शब्द ढूंढ निकाला है—’पोस्ट-ट्रुथ’। आसान भाषा में समझें तो इसका मतलब है: “तथ्य गए तेल लेने, हमारी कहानी ही असली सच है!” सीधे-सीधे क्यों नहीं कहते कि अंग्रेजी मीडिया ने कांग्रेस के पुराने रोने-धोने को एक नया फैशनेबल नाम दे दिया है? जब चुनाव जीत जाओ, तो जनता महान और लोकतंत्र की विजय; और जब हार जाओ, तो चिल्लाओ—”अरे रे! यह तो ‘पोस्ट-ट्रुथ’ की राजनीति है, ईवीएम हैक हो गई है और लोकतंत्र आईसीयू में अंतिम सांसें ले रहा है!” ‘काक-वाणी’ इस बौद्धिक जुगाली को नमन करती है।

सत्य जब ‘पोस्ट’ हो जाए और अविश्वास ‘फैक्ट्री’ में बने!

हमारे कांग्रेस के ज्ञानी रणनीतिकारों को देख लीजिए। उन्होंने अविश्वास पैदा करने को एक कुटीर उद्योग बना दिया है। अंग्रेजी में इसे ‘मैन्युफैक्चरिंग डिस्ट्रस्ट’ कहा जा रहा है। वाह! यानी अविश्वास भी अब एक मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट है, जिसका कच्चा माल केवल विपक्ष के कार्यालय में मिलता है। अगर चुनाव आयोग चुनाव कराए, तो आयोग बिक चुका है। अगर सुप्रीम कोर्ट कोई फैसला सुनाए, तो न्यायपालिका पर दबाव है। और अगर देश की जनता वोट न दे, तो जनता ही ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ से गुमराह हो चुकी है!

मतलब, गलती गलती से भी राहुल जी या उनकी रणनीतियों की नहीं है। गलती उस लोकतंत्र की है जो कांग्रेस को जिताने से इनकार कर देता है!

‘लोकतंत्र खतरे में है’ का सदाबहार अलार्म

जनता बेचारी सुबह उठकर चाय की चुस्की लेती है और टीवी पर सुनती है—”बधाई हो, लोकतंत्र आज फिर खतरे में है!” ‘काक-वाणी’ की कांव-कांव पूछना चाहती है कि भाई, जब तेलंगाना या हिमाचल में आपकी सरकार बनती है, तब क्या लोकतंत्र बैंकॉक पिकनिक मनाने चला जाता है? तब क्या ईवीएम से अचानक ‘सत्य’ की पावन किरणें फूटने लगती हैं? लेकिन जैसे ही किसी राज्य में सूपड़ा साफ होता है, ‘पोस्ट-ट्रुथ’ का जिन्न चिराग से बाहर आ जाता है।

काक-वाणी का निष्कर्ष

सच्चाई यह है कि जब आपके पास धरातल पर काम करने के लिए ठोस नीतियां और जनसमर्थन नहीं होता, तो आप अंग्रेजी के बड़े-बड़े शब्द उधार लेते हैं। लेकिन अविश्वास का यह व्यापार अब मंदा पड़ चुका है। जनता समझ चुकी है कि संस्थाओं पर कीचड़ उछालना ही जिनका मुख्य घोषणापत्र बन जाए, उन्हें ‘पोस्ट-ट्रुथ’ नहीं, ‘पोस्ट-इलेक्शन’ आत्मचिंतन की जरूरत होती है। वरना लोकतंत्र तो अपनी जगह मजे में रहेगा, पर आपकी पार्टी इतिहास के ‘पोस्ट-स्क्रिप्ट’ में सिमट कर रह जाएगी!


संदर्भ मुख्य समाचार: यहाँ देखें

कागा जी