भारतीय लोकतंत्र में ‘निर्दयता’ का महा-उत्सव: फ्रंटलाइन रो रहा है, और हम पॉपकॉर्न खा रहे हैं!

अरे वाह! अंग्रेजी की ‘फ्रंटलाइन’ पत्रिका ने अपने महंगे और गंभीर पन्नों पर बड़ा ही क्रांतिकारी खुलासा किया है—”भारतीय लोकतंत्र और राजनैतिक निर्दयता का सामान्यीकरण”। ‘काक-वाणी’ के इस कौवे को तो यह पढ़कर इतनी ज़ोर से हंसी आई कि पेड़ की सूखी डाल से गिरते-गिरते बचा। मतलब, देश के परम ज्ञानी बुद्धिजीवियों को अब जाकर समझ आया कि भारतीय राजनीति में ‘निर्दयता’ का नॉर्मलाइजेशन हो चुका है? अरे हुज़ूर, जिसे आप ‘क्रूरता’ कह रहे हैं, वो तो हमारे लोकतंत्र की नई ‘विटामिन-डी’ है, जिसके बिना राजनीति का शरीर ही नहीं चलता!

क्रूरता नहीं साहब, यह तो 5G लोकतंत्र का ‘सॉफ्टवेयर अपडेट’ है!

आजकल के राजनीतिशास्त्रियों को हर चीज़ में समस्या ही दिखती है। अब अगर कोई नेता अपने विरोधी के घर पर बुलडोजर चलवा दे, तो इसे ‘निर्दयता’ कहेंगे या ‘त्वरित इंसाफ’? किसी विपक्षी नेता को केंद्रीय एजेंसियों की मदद से जेल में ठूँसकर उसकी चाबी नाले में फेंक देना, अब क्रूरता नहीं, बल्कि ‘सुशासन’ का आधुनिक मॉडल बन चुका है। काक-वाणी का स्पष्ट मानना है कि हमारी राजनीति में दया, करुणा, मर्यादा और भद्रता की बातें वैसी ही हैं, जैसे बिना इंटरनेट का स्मार्टफोन—बिल्कुल बेकार और आउटडेटेड!

जनता को ‘नैतिकता’ नहीं, केवल ‘हाई-वोल्टेज ड्रामा’ चाहिए

फ्रंटलाइन वाले चश्मा लगाकर लोकतंत्र की गिरती सेहत की चिंता कर रहे हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं दिखता कि हमारे देश की महान जनता इस निर्दयता का भरपूर आनंद ले रही है। टीवी डिबेट्स के रात 9 बजे वाले दंगल में जब तक एक प्रवक्ता दूसरे की मर्यादा को नीलाम न कर दे, तब तक देशवासियों को खाना हजम ही नहीं होता। किसी का चरित्र हनन करना, किसी के निजी जीवन पर भद्दे तंज कसना, और विरोधी को पूरी तरह ‘मिटा देने’ की धमकी देना—यह सब अब राजनैतिक योग्यता का नया पैमाना है। जो जितना निर्दयी है, वो उतना ही बड़ा ‘मजबूत नेता’ माना जाता है।

काक-वाणी का तीखा निष्कर्ष

इसलिए, फ्रंटलाइन के बौद्धिक वीरों, यह रोना-धोना बंद कीजिए! हमारे इस विशाल लोकतंत्र में अब वही नेता सिकंदर है, जो अपने प्रतिद्वंद्वी को मानसिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से पूरी तरह कुचल सके। अगर आपको राजनीति में ‘संविधान की गरिमा’ और ‘सहानुभूति’ ढूंढनी है, तो किसी पुरानी इतिहास की किताब में खोजिए। आज के समय में तो जिसके पास जितनी कम ‘संवेदना’ और जितना बड़ा ‘माइक’ है, वही जनता का असली चहेता है। काँव-काँव!


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कागा जी