लोकतंत्र में इस्तीफा मांगना भी एक राष्ट्रीय खेल बन चुका है!

इस्तीफा? वो क्या होता है भाई?

वाह! क्या अद्भुत दृश्य है। हमारे देश के फुर्सत में जी रहे प्रदर्शनकारियों और विपक्ष को अचानक लगा कि चुनाव आयोग के दफ्तर की तरफ पैदल मार्च निकाल लेने से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार साहब अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर घर चले जाएंगे। अरे भाई, भारतीय राजनीति और नौकरशाही में पद ग्रहण करने की तो गाजे-बाजे वाली गारंटी होती है, लेकिन पद छोड़ने की? वह तो बस एक पुरानी पौराणिक कथा बनकर रह गई है!

चाय का समय और बेफिजूल का शोर

ज़रा कल्पना कीजिए, हमारे मुख्य चुनाव आयुक्त महोदय अपने वातानुकूलित दफ्तर में बैठकर बड़े सुकून से बिस्कुट को चाय में डुबो ही रहे होंगे कि बाहर से ‘इस्तीफा दो’ के नारे गूंजने लगे। कितनी असभ्यता है यह! क्या अब देश के इतने बड़े संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति चैन से शाम की चाय भी नहीं पी सकता? इन प्रदर्शनकारियों को समझना चाहिए कि चुनाव आयोग एक बेहद निष्पक्ष संस्था है—इतनी निष्पक्ष कि उसे खुद याद नहीं रहता कि आखिरी बार उसने पक्षपात कब नहीं किया था!

मांगने से तो भगवान भी नहीं मिलते!

वैसे, इन मार्च निकालने वालों की मासूमियत पर काक-वाणी को बेहद तरस आता है। उन्हें लगता है कि एक तख्ती लहराने और चार नारे लगाने से चुनाव आयोग अपनी ‘कठिन तपस्या’ को बीच में ही छोड़ देगा। अरे साहिब, जब चुनाव प्रक्रिया इतनी निष्पक्ष है कि परिणाम आने से पहले ही सबको पता होता है कि कौन जीतेगा, तो फिर इस्तीफा किस खुशी में? अगर हर चुनाव के बाद इस्तीफा मांगा जाने लगा, तो देश में नए आयुक्त ढूंढने का एक अलग मंत्रालय खोलना पड़ जाएगा।

काक-वाणी की मुफ्त सलाह

हमारा तो प्रदर्शनकारियों को यही भ्रातृस्नेह पूर्ण सुझाव है कि चुनाव आयोग के गेट तक धूप में पैदल जाने के बजाय थोड़ा आगे निकल जाएं और इंडिया गेट पर ठंडक का अहसास कराने वाली आइसक्रीम खाएं। क्योंकि आज के दौर में इस्तीफा मांगना वैसा ही है जैसे किसी मरुस्थल में हल चलाकर धान उगाने की उम्मीद करना। और हां, ज्ञानेश कुमार जी को घबराने की रत्ती भर भी जरूरत नहीं है; हमारे लोकतंत्र में ऐसी आवाजें केवल बैकग्राउंड म्यूजिक की तरह बजती रहती हैं, जिन्हें सुनकर कुर्सी और मजबूत हो जाती है!


संदर्भ मुख्य समाचार: यहाँ देखें

कागा जी