‘एंटायर पॉलिटिकल साइंस’ का नया मास्टरक्लास: छात्र शक्ति का इतिहास और प्रवचन की राजनीति

‘काक-वाणी’ के प्रिय बुद्धिजीवियों, आखिरकार वह ऐतिहासिक क्षण आ ही गया! ‘द वायर’ के पर्दे पर जावेद अंसारी साहब ने हमें ‘एंटायर पॉलिटिकल साइंस’ (संपूर्ण राजनीति शास्त्र) का वह दुर्लभ ज्ञान बांट दिया है, जिसकी तलाश में देश का मीडिया और विपक्ष बरसों से भटक रहा था। वैसे, ‘एंटायर पॉलिटिकल साइंस’ शब्द सुनते ही देश के नागरिकों के चेहरे पर जो दिव्य मुस्कान तैर जाती है, उसे किसी डिग्री या विश्वविद्यालय के कागजी ठप्पे की जरूरत नहीं है।

डिग्री कागजी हो सकती है, लेकिन ‘छात्र शक्ति’ की लाठी असली है!

अंसारी साहब ने भारतीय राजनीति में ‘छात्र शक्ति’ के इतिहास का ऐसा झन्नाटेदार संक्षिप्त परिचय दिया है कि मानो देश के सारे दिग्गज राजनेता कॉलेज की कैंटीन में चाय-समोसा खाते-खाते ही भावी सरकार चलाने का ब्लूप्रिंट तैयार कर चुके थे। जेपी आंदोलन से लेकर मंडल कमीशन और आज के दौर के प्रदर्शनों तक—छात्रों ने हमेशा सरकारों की नींद उड़ाई है। हालांकि, यह अलग बात है कि वही छात्र जब खुद नेता बन जाते हैं, तो अगले ही दिन से छात्रों पर लाठीचार्ज करवाने का नया इतिहास रचते हैं। वाह! क्या अद्भुत चक्रव्यूह है।

पुराने ज़माने में छात्र राजनीति का मतलब होता था—सड़कों पर उतरना, विचारधारा के लिए लाठियां खाना और देश की दशा-दिशा बदलना। लेकिन आज के ‘एंटायर पॉलिटिकल साइंस’ के नए दौर में छात्र शक्ति का स्वरूप थोड़ा ‘डिजिटल’ और ‘हाइटेक’ हो चुका है। अब छात्र शक्ति का अर्थ है: सुबह व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से ज्ञान प्राप्त करना, दोपहर में ट्विटर पर हैशटैग ट्रेंड कराना और शाम को टीवी चैनलों के डिबेट शो में जाकर चिल्लाना।

‘व्हाट्सएप ज्ञान’ और ‘उदारवादी विमर्श’ का अनूठा संगम

एक तरफ देश में सत्ता पक्ष के समर्थक इतिहास की नई परिभाषाएं गढ़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ हमारे वरिष्ठ पत्रकार अतीत की गलियों में ‘छात्र क्रांति’ की टॉर्च जलाकर खोई हुई साख ढूंढ रहे हैं। सच तो यह है कि आज की राजनीति में छात्र केवल दो ही काम के बचे हैं—या तो वे चुनावी रैलियों में ताली बजाने वाली ‘मुफ्त की भीड़’ बनें, या फिर बेरोजगारी के आंकड़े बनकर किसी न्यूज रिपोर्ट का विषय।

खैर, अंसारी साहब के इस ‘एंटायर पॉलिटिकल साइंस’ के पाठ से यह तो साबित हो गया कि भारत में राजनीति सीखने के लिए किताबों की नहीं, बल्कि एक कड़क भाषण, एक तीखे जुमले और किसी भी पार्टी का झंडा उठाने की कला आनी चाहिए। बाकी इतिहास तो हर पांच साल में देश की जनता खुद ही लिख देती है!


संदर्भ मुख्य समाचार: यहाँ देखें

कागा जी