ड्रैगन की ‘गर्मी’ और बाबू का ‘जुकाम’: जब एक बयान से कूटनीति की बर्फ जम गई!

नमस्कार! मैं ‘काक-वाणी’ का विशेष संवाददाता, रायता फैलाओ विभाग से। अंतरराष्ट्रीय मीडिया में मातम का माहौल है। खबर आई है कि भारत और चीन के बीच जो जम चुकी बर्फ पिघलकर कूटनीतिक शरबत बनने ही वाली थी, उसमें अरुणाचल प्रदेश के एक सिरफिरे सीमा अधिकारी ने ‘सच’ का नींबू निचोड़ दिया। बीबीसी की मानें तो इस अधिकारी के एक बयान ने दोनों देशों के सुधरते रिश्तों की धूप पर गहरे ‘काले बादल’ मँडरा दिए हैं।

शाही चाय, मोमोज और कागजी कूटनीति

दिल्ली और बीजिंग के वातानुकूलित कमरों में बैठे हमारे परम ज्ञानी राजनयिक महीनों से फाइलों का आदान-प्रदान कर रहे थे। कैमरे के सामने ऐसी बनावटी मुस्कानें बिखेरी जा रही थीं, मानो चीनी ड्रैगन अब लाल आँखें दिखाना छोड़कर शुद्ध शाकाहारी मोमोज का लुत्फ उठाने भारत आ रहा हो। माहौल इतना सुहाना बना दिया गया था कि लगा मानो लद्दाख और अरुणाचल की बर्फीली सीमाओं पर सैनिक बंदूकें फेंककर ‘अंताक्षरी’ खेलने ही वाले हैं। लेकिन कूटनीति का काँच इतना नाजुक निकला कि एक स्थानीय बाबू की जुबान क्या फिसली, शांति का शीशा ही चटक गया।

जब शून्य से नीचे के तापमान पर सच उबल पड़ा

अब जरा उस बदकिस्मत सीमा अधिकारी की हिमाकत तो देखिए! जो इंसान शून्य से 10 डिग्री नीचे तापमान में अपनी हड्डियों को जमने से बचा रहा है, उसने जमीनी हकीकत पर दो शब्द क्या बोल दिए, दिल्ली और बीजिंग के गलियारों में हड़कंप मच गया। विदेश मंत्रालय के साहबान अब अपना माथा पीट रहे हैं— ‘अरे भाई! तुम्हें किसने कहा था कि धरातल का सच बोलो? तुम्हारा काम बस फाइलें आगे बढ़ाना और शांति के कागजी कपोत उड़ाना था!’

वैसे सोचने वाली बात यह भी है कि बीजिंग का दिल कितना कमजोर है! क्या ड्रैगन का गुस्सा छुईमुई के पौधे जैसा है जो एक बयान से ही मुरझा गया? या फिर यह तथाकथित ‘रिश्तों का पिघलना’ सिर्फ लुटियंस दिल्ली के पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन तक ही सीमित था?

काक-वाणी का कड़वा ज्ञान

काक-वाणी का स्पष्ट मानना है कि अगर दो महाशक्तियों की कूटनीति इतनी फुसफुसी है कि एक अधिकारी के बयान से उस पर ग्रहण लग जाए, तो समझ लीजिए कि वह कूटनीति नहीं, बल्कि ताश के पत्तों का महल थी। अब हमारी सरकार को सीमा पर तैनात अधिकारियों के लिए एक नया फरमान जारी कर देना चाहिए: ‘जब तक ड्रैगन मुस्कुराए, तब तक अपने मुँह पर फेवीकोल लगा कर रखें।’ क्योंकि सच बोलना कूटनीतिक अपराध है, और शांति सिर्फ कागजों पर ही अच्छी लगती है!


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कागा जी