नमस्कार देशवासियों! ‘काक-वाणी’ के इस नए अंक में आपका स्वागत है। हमारे देश का लोकतंत्र आज इतना नाजुक हो चुका है कि दिल्ली की सड़कों पर लगे दो लोहे के बैरिकेड इसे तुरंत खतरे में डाल देते हैं। जी हां, हाल ही में ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन के हमारे परम तेजस्वी नेताओं ने एक और भव्य रैली का आयोजन किया। रैली का मुख्य उद्देश्य देश और संविधान को बचाना था, लेकिन अफसोस! दिल्ली पुलिस ने बसें और बैरिकेड लगाकर क्रांति का रास्ता ही रोक दिया।
बैरिकेड्स और लोकतंत्र की ‘अकाल मृत्यु’
विपक्षी नेताओं का गंभीर आरोप है कि केंद्र सरकार उनके विरोध प्रदर्शन को दबाने के लिए पूरी सरकारी ताकत झोंक रही है। अब आप ही सोचिए, अगर विपक्ष के शूरवीर नेता सुबह का नाश्ता करके देश में क्रांति लाने निकलें और रास्ते में पुलिस की बैरिकेडिंग मिल जाए, तो क्या यह तानाशाही नहीं है? काक-वाणी का तो स्पष्ट मानना है कि केंद्र सरकार को विपक्षी रैलियों के लिए दिल्ली की सीमाओं पर रेड कारपेट बिछाना चाहिए, साथ में गर्म समोसे और चाय का प्रबंध भी करना चाहिए। आखिर बिना जलपान के लोकतंत्र की रक्षा कैसे हो सकती है?
नेताओं का कहना है कि उन्हें जनता तक नहीं पहुंचने दिया जा रहा। अरे साहब! जब चुनाव के नतीजों में जनता खुद आपसे थोड़ी दूरी बना लेती है, तो बेचारी पुलिस के बैरिकेड्स को दोष देने से क्या हासिल होगा?
जब जीतें तो जनादेश, हारें तो मताधिकार का हनन!
इस महारैली में हमारे आदरणीय विपक्षी नेताओं ने दूसरा सबसे बड़ा चिंताजनक मुद्दा उठाया—‘मताधिकार और लोकतंत्र पर खतरा’। उनका दावा है कि सरकार आम जनता से वोट देने का हक छीन रही है और चुनाव प्रक्रिया में गड़बड़ी कर रही है। काक-वाणी इस तर्क से पूरी तरह सहमत है!
विपक्ष का गणित बेहद सीधा और पारदर्शी है—जब वे किसी राज्य में चुनाव जीतते हैं, तो वह ‘जनता की महान विजय’ और ‘सच्चा जनादेश’ होता है। लेकिन जैसे ही वे चुनाव हारते हैं, तो यह तुरंत साबित हो जाता है कि लोकतंत्र की हत्या हो चुकी है और ईवीएम से लेकर वोटर लिस्ट तक सब कुछ हैक हो चुका है। कितना सुंदर और सुविधाजनक सिद्धांत है!
निष्कर्ष: अगली रैली का इंतजार
कुल मिलाकर, ‘इंडिया’ ब्लॉक की यह रैली भी पुरानी रैलियों की तरह बेहद सफल रही। नेताओं को गरजने के लिए माइक मिल गया, कैमरों की चमक मिल गई और शाम के टीवी डिबेट्स के लिए भरपूर मसाला मिल गया। अब अगली रैली की तैयारियाँ शुरू हो चुकी हैं, जहाँ फिर वही पुराने भाषण होंगे, वही बैरिकेड्स होंगे और लोकतंत्र एक बार फिर से ‘अंतिम सांसें’ गिन रहा होगा। तब तक के लिए, काक-वाणी सुनते रहिए और सड़कों पर बैरिकेड्स से बचकर चलिए!
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