सोचिए, आप मई की झुलसती गर्मी में बैठे हैं और अगस्त में आने वाली किसी बड़ी बॉलीवुड फिल्म की टिकट बुक कर रहे हैं! सुनने में कितना अनोखा लगता है ना? हॉलीवुड में ‘मार्वल’ या ‘अवतार’ जैसी मेगा-बजट फिल्मों के लिए 100 दिन पहले एडवांस बुकिंग खुलना बहुत आम बात है। लेकिन जब बात हमारे रंग-बिरंगे बॉलीवुड की आती है, तो जनाब… रिलीज के तीन दिन पहले तक तो यही सस्पेंस बना रहता है कि फिल्म शुक्रवार को सिनेमाघरों में लगेगी भी या नहीं!
हाल ही में ‘लाइवमिंट’ की एक रिपोर्ट में इस बात का दिलचस्प विश्लेषण किया गया कि आखिर भारतीय सिनेमा हॉलीवुड के इस 100-दिन वाले एडवांस बुकिंग मॉडल की नकल क्यों नहीं कर सकता। ‘काक-वाणी’ के आज के इस चटपटे शोबाज़ एपिसोड में आइए खोलते हैं इसके पीछे के कुछ मजेदार और कड़वे राज!
1. सेंसर बोर्ड का सस्पेंस और आखिरी मिनट की ‘कट-छंटाई’
हॉलीवुड में फिल्में रिलीज से कई महीने पहले बनकर डिब्बे में पैक हो जाती हैं। हमारे यहाँ का गणित थोड़ा अलग है! यहाँ फिल्म शुक्रवार को रिलीज होनी होती है और बुधवार की रात तक डायरेक्टर साहब वीएफएक्स (VFX) ठीक कर रहे होते हैं या गानों की ट्रिमिंग में व्यस्त रहते हैं। ऊपर से सेंसर बोर्ड (CBFC) का कट-छंटाई वाला सस्पेंस! जब तक हाथ में सेंसर सर्टिफिकेट न आ जाए, तब तक थियेटर मालिक टिकट खिड़की खोलने का जोखिम नहीं लेते।
2. ‘स्क्रीन काउंट’ की जंग और स्टार्स का ईगो!
भारतीय सिनेमा में किस फिल्म को कितने शो मिलेंगे, इसकी असली जंग गुरुवार की आधी रात तक चलती है। जब दो बड़ी फिल्में आपस में टकराती हैं, तो डिस्ट्रीब्यूटर्स और मल्टीप्लेक्स के बीच खिंचाव चरम पर होता है। 100 दिन पहले बुकिंग खोलना तो दूर, यहाँ रिलीज से 100 घंटे पहले तक यह तय नहीं हो पाता कि किस थियेटर में कौन सा शो चलेगा!
3. ‘लास्ट मिनट थ्रिल’ के शौकीन भारतीय दर्शक
हम भारतीय एडवांस प्लानिंग में थोड़े ढीले और आखिरी वक्त के रोमांच के शौकीन हैं। 100 दिन बाद क्या होगा, यह सोचकर आज पैसे फंसाना हमें रास नहीं आता। यहाँ तो शुक्रवार की ‘माउथ पब्लिसिटी’ और शनिवार के रिव्यू देखकर रविवार का फैमिली प्लान बनता है। अगर 3 महीने पहले बुकिंग खोल भी दी जाए, तो रिलीज आते-आते जनता का मूड या सोशल मीडिया का ट्रेंड बदलने का खतरा रहता है।
4. डायनामिक प्राइसिंग का फंडा
आजकल बॉलीवुड में टिकट के दाम स्थिर नहीं रहते। फिल्म का माहौल और क्रेज देखकर दाम बढ़ा दिए जाते हैं और अगर फिल्म ठंडी पड़े तो डिस्काउंट ऑफर आ जाते हैं। 100 दिन पहले रेट लॉक कर देना थियेटर मालिकों के लिए बड़े फायदे का सौदा नहीं होता।
काक-वाणी टेक: संक्षेप में कहें तो, बॉलीवुड का असली मजा ही इस ‘आखिरी वक्त के ड्रामे’ में है। जब तक रिलीज के दो दिन पहले टिकट ऐप क्रैश न हों, तब तक हमारे यहाँ सिनेमा का माहौल ही नहीं बनता! इसलिए, 100 दिन का इंतजार हॉलीवुड को मुबारक, हमारे लिए तो वो ‘अंतिम 72 घंटे’ का ड्रामा ही काफी है!
संदर्भ मुख्य समाचार: यहाँ देखें