माटी का दीया और जीवन का सच: एक मार्मिक लोककथा

एक व्यग्र धनवान की खोज

बहुत पुरानी बात है, नर्मदा नदी के तट पर बसे एक शांत गाँव में सोमदेव नाम का एक वृद्ध मूर्तिकार रहता था। सोमदेव की बनाई मूर्तियों में इतना जीवंत भाव होता था कि लोग उन्हें देखकर भावुक हो जाते थे। उसी गाँव में माधव नाम का एक अत्यंत धनी व्यापारी भी रहता था। उसके पास अपार संपत्ति, विशाल महल और अनगिनत सेवक थे, लेकिन उसके मन में रत्ती भर भी शांति नहीं थी। वह हमेशा एक अनजाने खालीपन और मानसिक अशांति से जूझता रहता था।

एक दिन, अपनी अशांति से तंग आकर माधव वृद्ध मूर्तिकार सोमदेव की कुटिया में पहुँचा। उसने नम आँखों से पूछा, “बाबा, मेरे पास सब कुछ है, फिर भी मेरा मन भीतर से खाली क्यों है? मुझे जीवन का सच बताने वाली लोककथा या कोई ऐसा मार्ग बताइए, जिससे मुझे आत्मशांति मिल सके।”

नदी किनारे की परीक्षा

सोमदेव मुस्कुराए और माधव को लेकर नदी के शांत किनारे पहुँचे। उन्होंने अपनी झोली से माटी का एक छोटा सा दीया निकाला और माधव के हाथों में थमा दिया। सोमदेव ने कहा, “माधव, इस दीये में नदी से जल भरकर लाओ।”

माधव ने दीये में पानी भरा, लेकिन दीये की तली में एक बारीक छेद था, जिससे सारा पानी पलभर में बह गया। माधव ने बार-बार प्रयास किया, पर हर बार दीया रीता का रीता ही रहा। परेशान होकर माधव बोला, “बाबा! आप यह क्या कर रहे हैं? छेद वाले दीये में पानी कभी रुक सकता है क्या?”

वृद्ध सोमदेव ने शांत स्वर में कहा, “माधव, यही तुम्हारा जीवन है। यह दीया तुम्हारा मन है, और इसमें भरता पानी तुम्हारी धन-दौलत और भौतिक इच्छाएँ हैं। तुम्हारे मन में अहंकार, तृष्णा और स्वार्थ के कई छेद हैं। तुम चाहे जितना भी धन इकट्ठा कर लो, वह सब इन छेदों से बह जाएगा और तुम सदा भीतर से खाली ही रहोगे।”

जीवन का अंतिम सत्य

माधव की आँखों से आँसू छलक पड़े। उसने रोते हुए पूछा, “तो फिर इस खालीपन को भरने का क्या उपाय है, बाबा?”

सोमदेव ने नदी की गीली मिट्टी उठाई, दीये के छेद पर लेप दिया और उसमें एक छोटा सा पौधा रोप दिया। फिर उन्होंने नदी से थोड़ा सा जल लेकर उस पौधे में डाला। इस बार पानी बहकर व्यर्थ नहीं गया, बल्कि मिट्टी ने जल सोख लिया और पौधा मुस्कुराने लगा।

सोमदेव ने माधव के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “माधव! जीवन का असली सच यह है कि केवल अपने लिए बटोरने से जीवन खाली रहता है। लेकिन जब तुम अपने भीतर ‘सहानुभूति और परोपकार’ का पौधा रोप लेते हो, तो जीवन सार्थक हो जाता है। दूसरों के दुखों को समझना और निस्वार्थ प्रेम बाँटना ही इस जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई है।”

माधव को अपने जीवन की दिशा मिल चुकी थी। उसका अहंकार बह गया था और मन में असीम शांति का विस्तार हो चुका था।

सीख (Moral)

सीख: जीवन का वास्तविक आनंद और शांति धन-दौलत के संचय में नहीं, बल्कि निस्वार्थ भाव से दूसरों की सेवा करने और प्रेम बाँटने में निहित है। स्वार्थ मनुष्य को भीतर से खोखला करता है, जबकि परोपकार जीवन को पूर्णता देता है।

कागा जी