‘विदेशी हाथ’: भारतीय राजनीति का सर्वगुण संपन्न ‘ऑल-इन-वन’ बाम!

नमस्कार भारत! ‘काक-वाणी’ के तीखे और कड़वे संसार में आपका स्वागत है। हाल ही में ‘फ्रंटलाइन’ पत्रिका ने एक पुरानी घिसी-पिटी राजनीतिक कला पर फिर से रोशनी डाली है—भारत का ‘विदेशी हाथ’ (Foreign Hand) के प्रति अमर प्रेम! सच कहूँ तो, यदि हमारे देश के राजनेताओं के पास यह चमत्कारिक अदृश्य हाथ न होता, तो बेचारों को अपनी नाकामियों की जवाबदेही खुद लेनी पड़ती, जो कि भारतीय राजनीति के सिद्धांतों के बिल्कुल खिलाफ है।

इंदिरा गांधी से लेकर आज तक: एक महान परंपरा

यह ‘विदेशी हाथ’ राजनीति का कोई नया मेहमान नहीं है। सत्तर के दशक में जब भी इंदिरा गांधी को अपनी कुर्सी डगमगाती दिखती थी, वे तुरंत सीआईए (CIA) और ‘विदेशी ताकतों’ का भूत खड़ा कर देती थीं। आज दौर बदल चुका है, नेता बदल चुके हैं, लेकिन इस ‘जादुई हाथ’ की टीआरपी आज भी नंबर वन है। अब इस पुरानी डिश में जॉर्ज सोरोस, टूलकिट गैंग और पश्चिमी मीडिया का नया तड़का लगा दिया गया है। हमारे वर्तमान हुक्मरानों का भी यही मानना है कि दुनिया भर के शक्तिशाली देश और अरबपति दिन-रात बस इसी सोच में दुबले हो रहे हैं कि भारत की व्यवस्था को कैसे पटरी से उतारा जाए!

जब अपने हाथ तंग हों, तो ‘विदेशी हाथ’ ढूंढो!

भारतीय राजनीति का सबसे पहला और आखरी नियम है: अपनी गलती कभी मत मानो। यदि देश में किसान आंदोलन करें, तो वे किसान नहीं, विदेशी फंडेड एजेंट हैं। यदि युवा रोजगार मांगें, तो वे देशद्रोही साजिश का हिस्सा हैं। यदि रुपया वेंटिलेटर पर चला जाए या प्याज के दाम आसमान छूने लगें, तो समझ लीजिए कि किसी विदेशी ताक़त ने हमारी अर्थव्यवस्था पर टोटका कर दिया है।

सोचिए, इस एक बहाने ने हमारे नेताओं की कितनी मेहनत बचा ली है! उन्हें न तो काम करने की जरूरत है, न ही जनता को हिसाब देने की। बस चुनाव आते ही मंच पर खड़े होकर छाती ठोकिए और चिल्लाइए—“सावधान! देश खतरे में है, विदेशी हाथ सक्रिय है!” और बस, सारे बुनियादी मुद्दे गायब!

बड़ी अजीब विडंबना है! एक तरफ तो हमारे नेता उसी ‘विदेशी हाथ’ से डॉलर (FDI) खींचने के लिए दर-दर घूमते हैं, विदेशी नेताओं के साथ झप्पियाँ पाते हैं, और दूसरी तरफ जैसे ही देश का कोई नागरिक सवाल पूछ ले, वही हाथ अचानक भारत की संप्रभुता को नोचने आ जाता है। ‘काक-वाणी’ का तो यही सुझाव है कि भारत सरकार को अब इस ‘विदेशी हाथ’ को आधिकारिक रूप से ‘राष्ट्रीय बचावकर्म’ घोषित कर देना चाहिए, जिसने दशकों से हमारे नेताओं की साख बचा रखी है।


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कागा जी