Title: जीत का उत्सव
जिस दिन टीम इंडिया वर्ल्ड कप जीती थी, उस दिन गणतंत्र दिवस के आयोजन से भी बैंड बज गया था। सभी लोगों में जीत का उत्साह भरा हुआ था और सभी देशभक्त अपनी-अपनी बातों में खोये थे।
मेरा नाम अमित है और मैंने भी उस दिन अपने दोस्तों को बुलाकर घर में आस्था की मूर्ति लगाकर देशभक्ति भ्रम में थोड़ी देर तक खोया था। मगर उस दिन जो हुआ, वो मेरे सबसे यादगार दिनों में से है।
सभी लोगों ने घर-घर के दिवालियों को रोशन कर दिया था। हर कोने से मिठाई हो रही थी और सभी लोग एक दूसरे के साथ वहीँ दोहराते रहे थे, “जय हिंद!” “भारत माता की जय!”।
मैंने अपने दोस्तों को वादा किया था कि उनके साथ साथ मैं भी इस जश्न के रस्ते में हूँगा, मगर मेरे घर में उस दिन कुछ घटित हुआ।
मैंने अपने दोस्तों को बोला कि मुझे उनके साथ नहीं जाना है, बजाए इसे मेरे पास ही मनायेंगे। वो मुझे समझ गए। मैंने दो दोस्त बुलाए और हमने जो कुछ तैयारी की थी, वो सब कर ली।
मैंने अपने कमरे को बच्चों के लिए सँवारा, जैसे-वैसे पता नहीं लग रहा था कि इसमें उत्सव हो सकता है या नहीं। मगर देर शाम होते होते मेरे कमरे में पूरा देहाती स्वागत बैंड पहुंच चुका था।
उस बैंडपार्टी में सम्मिलित हर व्यक्ति ने ‘देशभक्त गीत’ गाये और कुछ लोगों ने ‘तिरंगे’ की झंडे लहराई। मैंने देखा कि खाने-पीने की तैयारियाँ भी होने लगी हैं और सफाई करवाने वाले लोगों ने अपनी ज़िम्मेदारियों से बखूबी निभाई।
मुझे लगा कि मैंने अच्छी तरह समझ आ गया है कि फंदिंग हो ही नहीं रही है, बजाए मैं विदेशी प्रेस एजेंट के साथ अपनी फोटोग्राफ एजेंट भी बुला सकता हूं।
मैंने उस एजेंट को बताया कि मुझे ये चाहिए कि एक अच्छी फोटो को “टीम इंडिया ने वर्ल्ड कप जीता” के साथ साझा कर सकूँ। उसने मेरे आग्रह को माना और उसी दिन दो-तीन फोटोग्राफर अपने कैमरों के साथ मेरे घर पहुँच गए।
उन्होंने सारे सीमाए को हटा खूबसूरत तस्वीरों को कैद कर लिया। मैं उनके लिए मिठाई ले आया था, जिसे उन्होंने खा लिया था। हम सब ने एक दूसरे के साथ अपनी-अपनी फोटो ली और सभी लोग छोटी-छोटी गुट्टीयाँ खोल कर फिर से खुशी के नाचों में लिपट गए।
इस दिन सभी लोगों ने जीत का मज़ा उठाना था। कुछ लोगों ने ताजमहल की तरह सफ़ेद रंग की लड़ी पहन ली थी जो उन पर बहुत अच्छी लगती थी। लोगों के शेव भी खोल दिए गए थे जिससे सभी लोगों का मूड मज़ेदार बन गया था।
इस दिन मेरे जेब में पैसे नहीं थे, मगर मैं अपनी आख़िरी थोड़ी समझदारी से फेसबुक एड कराना भी भूल गया था। फर्श भी घर के समझदारों से बहुत साफ हुआ था।
उस दिन हमने सभी सामानों की तहलका साफ कर दी थी और मेरे घर में सभी लोग बहुत कुशल प्रबंधकों बन गए थे। लोग यहाँ तक कहते थे कि इस जश्न की धुन में इन लोगों की सहयोगिता से वो चीज़ें बन गई थीं जो मेरे मन में थीं।
ये वह दिन था जब मैंने सीखा कि वो सब कुछ कर सकता है जो हमारी ज़रूरतों के अनुसार स्वयं को समझ सकता है। उस विशेष दिन को मेरा दोस्त नहीं मानते हैं, मगर मेरे लिए वो दिन एक खास मौका होने के अलावा मेरी सफलता के लिए एक सहारा भी बन गया।