नमस्कार सिनेमा प्रेमियों! एक बार फिर मेलबर्न में रेड कारपेट सज चुका है और मौका है IFFM 2026 (Indian Film Festival of Melbourne) का। विदेशी धरती पर हमारे डायरेक्टर्स और एक्टर्स सज-धजकर पहुंच रहे हैं, तालियां बटोर रहे हैं और दुनिया को बता रहे हैं कि ‘हमारा सिनेमा बेस्ट है’। लेकिन ‘काक-वाणी’ की पैनी नजर से एक बड़ा सवाल निकलकर आया है—दुनिया तो हमारी फिल्में देख रही है और उनकी तारीफ करते नहीं थक रही, पर क्या हम खुद उन बेहतरीन फिल्मों को देख रहे हैं?
ग्लोबल तालियां बनाम लोकल ‘मसाला’
IFFM 2026 में इस बार ऐसी-ऐसी ऑफबीट और संवेदनशील फिल्मों की स्क्रीनिंग हो रही है, जिन्हें देखकर विदेशी दर्शक और क्रिटिक्स भी दांतों तले उंगली दबा रहे हैं। वहां आर्ट सिनेमा और असली मुद्दों पर बनी फिल्मों की जमकर वाह-वाही हो रही है। लेकिन जैसे ही ये फिल्में भारत के थिएटर्स में रिलीज होती हैं, इन्हें दर्शक ढूंढने के लिए टॉर्च जलानी पड़ती है। हमारे देश का कड़वा सच यह है कि हमें थिएटर्स में अक्सर वही फिल्में पसंद आती हैं, जहां हीरो हवा में गाड़ियां उड़ाए, बिना लॉजिक के विलेन को पीटे और बैकग्राउंड में कान फाड़ू म्यूजिक बजे। 500 करोड़ के क्लब वाली मसाला फिल्मों के शोर में अक्सर वो छोटी और दिल छू लेने वाली फिल्में गुम हो जाती हैं, जो असल में भारत का नाम विदेशों में रोशन करती हैं।
क्या बदल रहा है हमारा नजरिया?
सवाल सिर्फ फिल्म मेकर्स का नहीं है, बल्कि हमारा यानी दर्शकों का भी है। जब कोई बेहतरीन फिल्म ऑस्कर या IFFM जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अवॉर्ड जीतती है, तो हम सोशल मीडिया पर ‘प्राउड टू बी इंडियन’ लिखकर छाती चौड़ी कर लेते हैं। लेकिन जब वही फिल्म ओटीटी या नजदीकी सिनेमाघरों में रिलीज होती है, तो हम उसे ‘स्लो’ या ‘बोरिंग’ कहकर टाल देते हैं। मेलबर्न फिल्म फेस्टिवल ने एक बार फिर हमें आईना दिखाया है कि दुनिया भारतीय सिनेमा की विविधता की दीवानी हो रही है, जबकि हम खुद को केवल घिसे-पिटे फॉर्मूलों और रीमेक फिल्मों तक ही सीमित रख रहे हैं।
काक-वाणी की खरी-खरी: थोड़ा बदलिए अपना टेस्ट!
अगर हमें अपने सिनेमा को सच में जिंदा रखना है और ग्लोबल स्टेज पर हमेशा चमकते देखना है, तो केवल विदेशों में मिलने वाली तालियों से काम नहीं चलेगा। हमें अपनी जेब से टिकट के पैसे खर्च करके इन बेहतरीन और लीक से हटकर बनी फिल्मों को थिएटर्स में सपोर्ट करना होगा। तो अगली बार जब कोई अच्छी फिल्म रिलीज हो, तो केवल सोशल मीडिया पर उसका ट्रेलर देखकर मत छोड़िए। सिनेमाघर जाइए और असली सिनेमा का लुत्फ उठाइए, क्योंकि जब हम देखेंगे, तभी तो हमारा सिनेमा सच में आगे बढ़ेगा!
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