अंधे गजराज और नन्हीं चीकू की अनोखी दोस्ती

एक असहाय बुढ़ापा और अकेलापन

घने सुंदरवन के एक शांत कोने में गजराज नाम का एक बूढ़ा हाथी रहता था। कभी वह पूरे जंगल का सबसे शक्तिशाली और सम्मानित हाथी हुआ करता था, लेकिन ढलती उम्र के साथ उसकी आँखों की रोशनी पूरी तरह चली गई। जब वह अंधा हो गया, तो उसके अपने झुंड ने उसे एक बोझ समझकर जंगल में अकेला छोड़ दिया।

गजराज एक सूखे जलाशय के पास बैठकर अपनी किस्मत पर रो रहा था और अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा था। उसे महसूस हो रहा था कि अब इस दुनिया में उसके लिए कोई जगह नहीं बची है। भूख और प्यास से उसका विशाल शरीर कमजोर होता जा रहा था।

एक नन्हा मसीहा

उसी जलाशय के पास एक विशाल बरगद के पेड़ पर चीकू नाम की एक चुलबुली और दयालु गिलहरी रहती थी। चीकू कई दिनों से गजराज को भूखा-प्यासा और रोते हुए देख रही थी। एक दिन अपनी डरपोक प्रकृति को छोड़कर, वह हिम्मत करके गजराज की सूंड पर जा बैठी। गजराज अचानक हुए इस स्पर्श से चौंक गया।

चीकू ने अपनी मीठी आवाज़ में कहा, “प्रणाम दादाजी! आप इतने उदास क्यों हैं? क्या मैं आपकी कुछ मदद कर सकती हूँ?”

गजराज की अंधी आँखों से आँसू छलक पड़े। उसने भारी आवाज़ में कहा, “बेटी, मैं अंधा हूँ और अपनों ने मुझे छोड़ दिया है। मैं अब किसी काम का नहीं।”

चीकू ने मुस्कुराते हुए कहा, “आप ऐसा मत कहिए दादाजी! आपकी आँखें नहीं हैं तो क्या हुआ, मेरे पास तो आँखें हैं। आज से मैं आपकी आँखें बनूंगी और आप मेरी ताकत बनना।”

संकट की वो भयानक रात

उस दिन के बाद दोनों की जिंदगी बदल गई। चीकू पेड़ से मीठे फल तोड़कर गजराज के मुंह में डालती और गजराज अपनी सूंड से चीकू को पूरे जंगल की सैर कराता। लेकिन एक रात, जंगल में अचानक भयंकर आग लग गई। सूखी लकड़ियों के कारण आग तेजी से फैलने लगी। चारों तरफ हाहाकार मच गया। सभी जानवर अपनी जान बचाकर भाग रहे थे।

चीकू भी डर से कांपने लगी, क्योंकि आग की लपटें उनके करीब आ रही थीं। गजराज देख नहीं सकता था, लेकिन वह आग की गर्मी और चीखों को महसूस कर सकता था। उसने हिम्मत दिखाई और चीकू से कहा, “चीकू, डरो मत! तुरंत मेरी पीठ पर बैठ जाओ और मुझे रास्ता बताओ। हम इस आग से बाहर निकल जाएंगे।”

ताकत और सूझबूझ का अद्भुत मिलन

चीकू तुरंत गजराज के सिर पर बैठ गई। उसने आगे बढ़ते हुए गजराज को निर्देश देना शुरू किया—”दादाजी, सीधे चलिए… अब दाईं ओर मुड़िए… सामने एक जलता हुआ पेड़ गिर रहा है, बाईं ओर कदम बढ़ाइए!”

रास्ते में कई छोटे और असहाय जानवर भी मिले जो आग में फंस गए थे। गजराज ने अपनी सूंड से उन सभी को उठाकर अपनी पीठ पर बैठा लिया। चीकू के सही मार्गदर्शन और गजराज की असीम ताकत की वजह से वे सभी सुरक्षित रूप से नदी के पार पहुंच गए।

जो झुंड गजराज को बेकार समझकर छोड़ गया था, वे आज नदी के उस पार खड़े अपनी जान बचाने के लिए गजराज का धन्यवाद कर रहे थे। गजराज की आँखों में आज फिर आँसू थे, लेकिन इस बार ये आँसू लाचारी के नहीं, बल्कि सम्मान और खुशी के थे।

कहानी की सीख

सीख (Moral): इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि शारीरिक रूप से अक्षम या वृद्ध लोग कभी अनुपयोगी नहीं होते। यदि हम आपसी सहयोग, सम्मान और सच्ची सहानुभूति के साथ मिलकर काम करें, तो दुनिया की हर बड़ी से बड़ी विपत्ति को आसानी से हराया जा सकता है। एकता और सच्ची मित्रता में ही असली ताकत होती है।

कागा जी