अमेरिका का नया ‘रिटर्न गिफ्ट’: रूसी तेल खरीदो और सौ फीसदी टैरिफ पाओ!

वाह! लोकतंत्र के स्वयंभू ठेकेदार, यानी हमारे प्यारे ‘चाचा सैम’ ने एक बार फिर साबित कर दिया कि दुनिया में उनसे बड़ा हितैषी कोई नहीं है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने एक नया प्रस्ताव पारित किया है, जिसमें धमकी दी गई है कि अगर भारत ने रूस से सस्ता तेल खरीदना बंद नहीं किया, तो उस पर 100% टैरिफ ठोक दिया जाएगा। ‘काक-वाणी’ के इस विशेष अंक में आपका स्वागत है, जहां हम वैश्विक भाईचारे के इस नए ड्रामे की धज्जियां उड़ाएंगे।

लोकतंत्र का सबसे बड़ा दरोगा और तेल का खेल

अमेरिका का मानना है कि दुनिया के सारे नियम सिर्फ दूसरों पर लागू होते हैं। जब यूरोप रूसी गैस खरीदता है, तो वह ‘मजबूरी’ होती है। लेकिन जब भारत अपनी विशाल आबादी के लिए रूस से रियायती दरों पर तेल खरीदता है, तो यह ‘वैश्विक शांति के खिलाफ अपराध’ बन जाता है। वाह रे पश्चिमी दोहरा मापदंड! भारत ने चतुराई से रूस से कच्चा तेल खरीदा, उसे रिफाइन किया और फिर उसी तेल को यूरोप को ही ऊंचे दामों में बेच दिया। अब इस मास्टरस्ट्रोक पर अमेरिका के पेट में दर्द होना तो लाजिमी था। आखिरकार, आप स्वघोषित ‘सुपरपावर’ को उसकी ही कूटनीतिक बिसात पर मात कैसे दे सकते हैं?

जयशंकर साहब का चश्मा और अमेरिका का गुस्सा

अब सबकी नजरें हमारे विदेश मंत्री S Jaishankar पर टिकी हैं। अमेरिकी सांसदों को शायद यह याद नहीं है कि यह वो भारत नहीं है जो उनके एक प्रतिबंध के डर से सहम जाए। जयशंकर साहब का वह प्रसिद्ध बयान तो वाशिंगटन को आज भी चुभता होगा, जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘यूरोप की समस्याएं दुनिया की समस्याएं हैं, लेकिन दुनिया की समस्याएं यूरोप की समस्याएं नहीं हैं।’ अब देखना यह है कि इस 100% टैरिफ की धमकी पर वे अमेरिकी सीनेटरों को इतिहास और भूगोल का कौन सा नया पाठ पढ़ाते हैं।

सच तो यह है कि अमेरिका खुद कर्ज के पहाड़ पर बैठा है और महंगाई से त्रस्त है, लेकिन दुनिया पर धौंस जमाने की उसकी पुरानी बीमारी नहीं जा रही। अगर भारत से आने वाले सामानों पर 100% टैरिफ लगा भी दिया गया, तो अमेरिकी उपभोक्ताओं को ही अपनी जेबें और ढीली करनी पड़ेंगी। इसे कहते हैं अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारना, या यूं कहें कि कुल्हाड़ी पर खुद जाकर पैर दे मारना!

काक-वाणी का निष्कर्ष

अंत में, ‘काक-वाणी’ यही कहेगी कि तेल का यह खेल थमेगा नहीं। भारत को अपनी अर्थव्यवस्था चलाने के लिए सस्ते ईंधन की जरूरत है और रूस को खरीदार की। अमेरिका चाहे जितने भी प्रस्ताव पास कर ले, वैश्विक बाजार की हकीकत को बदला नहीं जा सकता। अब देखना यह है कि जब अगली बार अमेरिकी अधिकारी भारत आएंगे, तो जयशंकर साहब उन्हें चाय के साथ कौन सी कूटनीतिक कड़वी गोली पिलाते हैं। तब तक के लिए, आप अपनी गाड़ी की टंकी फुल कराइए, क्योंकि तेल तो रूसी ही रहेगा, चाहे वाशिंगटन में किसी का बीपी कितना भी हाई हो जाए!</p


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कागा जी