दुनियाभर के भू-राजनीतिक विश्लेषक और बड़े-बड़े थिंक टैंक जहां भारत की राजनीति को समझने में फेल हो गए, वहीं कतर के हमारे प्रिय ‘अल-जज़ीरा’ ने एक ऐसी क्रांतिकारी खोज की है कि खुद कार्ल मार्क्स भी अपनी कब्र में करवट बदल लें। अल-जज़ीरा का नया शोध कहता है कि भारत में अब ‘कॉकरोच’ यानी तिलचट्टा आंदोलन मोदी की भाजपा को अपनी राजनीति बदलने पर मजबूर कर देगा। जी हां, आपने बिल्कुल सही पढ़ा—तिलचट्टा! जो अब तक केवल रसोई के गंदे कोनों में पाया जाता था, वह अब अंतरराष्ट्रीय मीडिया के लिए भारतीय लोकतंत्र का नया मसीहा बन गया है।
अल-जज़ीरा की दिव्य दृष्टि और क्रांतिकारी तिलचट्टे
हम तो मुफ्त में ही विपक्षी नेताओं की रैलियों और गोदी मीडिया की बहसों में अपना सिर खपा रहे थे। असली क्रांति तो रसोई के सिंक और वाशबेसिन के नीचे छिपी बैठी थी। अल-जज़ीरा के चश्मे से देखें, तो भारत का आम कॉकरोच अब कोई साधारण कीट नहीं रहा, वह ‘अधिनायकवाद विरोधी’ विद्रोही बन चुका है। वह रात के अंधेरे में बाहर निकलता है, ताकि सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ अपना ‘मौन आक्रोश’ दर्ज करा सके। जब घर की मालकिन उन पर कीटनाशक छिड़कती है, तो अल-जज़ीरा को शायद उसमें मानवाधिकारों का क्रूर हनन और अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने की गंध आती है। मुमकिन है कि जल्द ही कुछ बुद्धिजीवी इन तिलचट्टों के अधिकारों के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दें।
क्या शाह और मोदी लेंगे आपातकालीन बैठक?
अब सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि क्या इस भयावह ‘कॉकरोच आंदोलन’ के बाद गृहमंत्री अमित शाह आधी रात को कैबिनेट की आपातकालीन बैठक बुलाएंगे? क्या राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अब काले रंग के इन छह पैरों वाले जांबाजों से निपटने के लिए कोई नई सर्जिकल स्ट्राइक प्लान करेंगे? कल्पना कीजिए, भाजपा का आईटी सेल जल्द ही सोशल मीडिया पर सक्रिय होकर नया नैरेटिव चलाएगा—”ये विदेशी फंडिंग वाले कॉकरोच हैं, जो भारतीय रसोई की संप्रभुता और एकता को खतरे में डाल रहे हैं।” वहीं, टीवी एंकर स्टूडियो में चीखते मिलेंगे, “इन तिलचट्टों का असली आका कौन है? इनका टूलकिट कहां तैयार हुआ?”
लोकतंत्र की नई परिभाषा और ‘काक-वाणी’ का निष्कर्ष
सच तो यह है कि जब अंतरराष्ट्रीय मीडिया को भारत विरोधी एजेंडे के लिए कोई ठोस मुद्दा नहीं मिलता, तो वे नाली के कीड़ों में भी लोकतंत्र का रक्षक ढूंढ लेते हैं। अल-जज़ीरा की इस बारीक और अद्भुत खोज के लिए ‘काक-वाणी’ उन्हें ‘सर्वोच्च कीट-पत्रकारिता सम्मान’ से नवाजती है। खैर, मोदी जी अपनी राजनीति बदलें या न बदलें, लेकिन इस अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट के बाद भारत के मध्यमवर्गीय घरों में ‘लक्ष्मण रेखा’ और कीटनाशकों की बिक्री में भारी उछाल जरूर आ जाएगा। अब देखना यह है कि अगला बड़ा आंदोलन चूहों का होता है या मच्छरों का, जिस पर अल-जज़ीरा फिर से मोदी सरकार के पतन की ऐतिहासिक भविष्यवाणी करेगा!
संदर्भ मुख्य समाचार: यहाँ देखें