मुग़ल सल्तनत में सम्राट अकबर के न्याय के चर्चे दूर-दूर तक थे। लेकिन एक दिन उनके दरबार में एक ऐसा मामला आया, जिसने सभी की आँखों को नम कर दिया। एक बूढ़ा और बीमार दरबारी, दीनदयाल, अपने तीन बेटों के साथ दरबार में हाजिर हुआ। दीनदयाल की आँखों में आंसू थे और शरीर कमजोरी से कांप रहा था। वह अपनी अंतिम घड़ियों में न्याय की भीख मांग रहा था।
अकबर का दरबार और एक बेबस पिता का दर्द
दीनदयाल ने रोते हुए सम्राट से कहा, “जहाँपनाह! मैंने जीवनभर ईमानदारी से इस दरबार की सेवा की। अब मेरी आखिरी सांसें करीब हैं। मेरे पास जीवनभर की गाढ़ी कमाई के रूप में एक बेशकीमती सोने का संदूक है। मेरे दो बड़े बेटे केवल मेरी संपत्ति के पीछे पड़े हैं, वे मेरी बीमारी में भी मुझसे केवल उस संदूक की चाबी मांगते हैं। वहीं मेरा सबसे छोटा बेटा मोहन दिन-रात आंसू बहाते हुए मेरी सेवा करता है। मैं अपनी संपत्ति उसे देना चाहता हूँ जो मुझसे सच्चा प्रेम करता है, न कि मेरी संपत्ति से।”
अकबर असमंजस में पड़ गए। दोनों बड़े बेटे खुद को पिता का सबसे बड़ा शुभचिंतक बता रहे थे और न्याय की मांग कर रहे थे। अकबर ने इस भावनात्मक उलझन को सुलझाने का जिम्मा अपने सबसे चतुर और संवेदनशील मंत्री बीरबल को सौंपा।
बीरबल की अनोखी परीक्षा
बीरबल ने स्थिति की गंभीरता को समझा और एक अनोखी योजना बनाई। उन्होंने तीनों बेटों को दरबार के बीच में बुलाया और एक बड़ा सा लकड़ी का संदूक वहां रखवा दिया। बीरबल ने बेहद गंभीर आवाज में कहा, “इस संदूक में तुम्हारे पिता की पूरी संपत्ति है। लेकिन ध्यान रहे, यह संदूक जादुई है। इसमें एक ऐसी अदृश्य जहरीली हवा बंद है जो केवल उसी को नुकसान पहुंचाएगी जो अपने पिता से झूठा प्रेम करता है। अगर किसी के मन में लालच हुआ, तो इसे खोलते ही उसकी मृत्यु हो जाएगी। लेकिन जो अपने पिता से सच्चा और निस्वार्थ प्रेम करता होगा, उसे कुछ नहीं होगा और वह संपत्ति का हकदार बनेगा।”
बीरबल ने आगे कहा, “अब तुम तीनों में से जो अपनी सच्चाई पर अडिग है, वह आगे आए और इस संदूक को खोले।”
यह सुनते ही दोनों बड़े बेटों के चेहरे डर से पीले पड़ गए। उनके मन में केवल लालच था और वे अपनी जान जोखिम में नहीं डालना चाहते थे। उन्होंने तुरंत पैर पीछे खींच लिए।
सच्चाई का खुलासा और सीख
तभी छोटा बेटा मोहन रोते हुए आगे आया। उसने कांपते हाथों से संदूक की तरफ कदम बढ़ाए और बोला, “मुझे धन-दौलत का कोई मोह नहीं है। लेकिन अगर इस संदूक को खोलने से मेरे पूज्य पिता के मन का यह संशय दूर होता है कि उनका बेटा उनसे प्यार नहीं करता, तो मैं अपनी जान देने को भी तैयार हूँ।”
जैसे ही मोहन ने रोते हुए संदूक का ढक्कन खोला, उसमें से कोई जहरीली हवा नहीं निकली। उसमें केवल दीनदयाल के हाथ से लिखा एक पत्र और कुछ पुराने खिलौने थे। बीरबल मुस्कुराए और बोले, “जहाँपनाह! असली परीक्षा यही थी। इस संदूक में कोई जहर नहीं था। यह तो केवल सच्चे और झूठे प्रेम को परखने का एक तरीका था।”
अकबर बीरबल की इस चतुर कहानी और न्याय से बेहद प्रभावित हुए। दोनों बड़े बेटों को शर्मिंदगी उठानी पड़ी और पूरी संपत्ति मोहन को सौंप दी गई।
सीख: इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि लालच इंसान को अंधा बना देता है, लेकिन सच्चा और निस्वार्थ प्रेम हमेशा विजयी होता है। रिश्तों की अहमियत पैसों से कहीं बढ़कर होती है।