उड़ता पंजाब अब ‘सुधरता पंजाब’ बना, तो नेताओं की ‘चुनावी डोज़’ का क्या होगा?

पंजाब से एक ऐसी ‘दुखद’ खबर आई है जिसने हमारे देश के कर्मठ और संवेदनशील राजनेताओं की रातों की नींद हराम कर दी है। एनडीटीवी की रिपोर्ट कहती है कि पंजाब के नशामुक्ति केंद्रों (Rehab Centers) में मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। अब आप आम नागरिक होने के नाते सोच रहे होंगे कि यह तो अच्छी बात है, लोग सुधर रहे हैं। लेकिन साहब, ‘काक-वाणी’ की दिव्य दृष्टि से देखिए! अगर पंजाब के युवा सचमुच सुधर गए और नशा छोड़ दिया, तो हमारे नेताओं के पास चुनाव लड़ने के लिए मुद्दा क्या बचेगा? राजनीति की असली ‘डोज़’ तो इसी समस्या से मिलती है!

नशामुक्ति से घबराए ‘चुनावी डॉक्टर’

सालों से पंजाब की सियासत ‘उड़ता पंजाब’ के पंखों पर सवार होकर उड़ रही है। हर चुनाव में नेताजी सफेद कुर्ता पहनकर मंच पर दहाड़ते थे, “हमें सत्ता दो, हम चार हफ्ते में नशा खत्म कर देंगे!” अब जब लोग खुद ही नशामुक्ति केंद्रों की तरफ भाग रहे हैं, तो विपक्षी दलों के पेट में मरोड़ उठना लाजिमी है। विरोधी दल इस बात से बेहद चिंतित हैं कि अगर जनता नशामुक्त हो गई, तो वे रैलियों में क्या चिल्लाएंगे? भगवान न करे, अगर कहीं बेरोजगारी, सड़क और विकास जैसे उबाऊ मुद्दों पर बात करनी पड़ गई, तो नेताओं का तो करियर ही चौपट हो जाएगा!

आंकड़ों का खेल और श्रेय लेने की जंग

जैसे ही नशामुक्ति के आंकड़े बढ़े, राज्य की सत्ताधारी पार्टी ने तुरंत अपनी पीठ थपथपानी शुरू कर दी। उनका दावा है कि नशामुक्ति केंद्रों में उमड़ती भीड़ उनकी ‘क्रांतिकारी नीतियों’ का जीवंत प्रमाण है। उधर, विपक्ष ने भी बिना पलक झपकाए नया तर्क ढूंढ लिया है। उनका कहना है कि नशामुक्ति केंद्रों में भीड़ इसलिए बढ़ रही है क्योंकि सरकार नशा रोकने में नाकाम रही है! वाह रे सियासत के उस्तादों! यानी बंदा नशा करे तो सरकार फेल, और बंदा नशा छोड़ने जाए तो भी सरकार फेल। इस अद्भुत तर्कशास्त्र के सामने तो दुनिया के बड़े-बड़े दार्शनिक भी घुटने टेक दें।

वोटों का ‘नशा’ सबसे खतरनाक

असल में, नेताओं को इस बात का डर नहीं है कि पंजाब का युवा बर्बाद हो रहा है या आबाद हो रहा है। उन्हें डर सिर्फ इस बात का है कि कहीं यह ‘मुद्दा’ उनके हाथ से न फिसल जाए। पंजाब की राजनीति में ड्रग्स एक ऐसा सदाबहार टॉपिक है, जिसे चुनावी कड़ाही में डालकर कभी भी वोटों का हलवा तैयार किया जा सकता है।

अंत में, ‘काक-वाणी’ का यही निष्कर्ष है कि पंजाब के युवाओं को तो रिहैब सेंटर भेजकर इलाज मिल जाएगा, लेकिन हमारे राजनेताओं को इस ‘चुनावी नशे’ से मुक्ति कौन दिलाएगा? जब तक राजनीति में वोटों का यह नशा कायम रहेगा, तब तक सुधार की हर कोशिश पर सियासत की चीलें ऐसे ही मंडराती रहेंगी।


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कागा जी