अरे भइया! दुनिया में अगर कोई चीज़ कूटनीति, उग्र भाषणों और टीवी स्टूडियो की चीख-पुकार पर भारी पड़ सकती है, तो वो है—चमकता हुआ हरा डॉलर! जी हां, CNBC की ताज़ा खबर बता रही है कि कनाडा और भारत के बीच 5.5 अरब डॉलर (यानी इतने ज़ीरो कि गिनते-गिनते आम आदमी का कैलकुलेटर ही रिटायर हो जाए) का एक बैंक टेकओवर हो रहा है। और इस खबर ने कनाडा के राजनेताओं और कर्मचारियों के पेट में ऐसा मरोड़ उठाया है कि पूछिए मत!
राजनयिक जंग अपनी जगह, 5.5 अरब का धंधा अपनी जगह!
कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो और भारत के बीच पिछले कुछ समय से जैसा ‘प्रेम संबंध’ चल रहा है, उसे देखकर तो लगता था कि दोनों देश एक-दूसरे की तरफ देखना भी पसंद नहीं करेंगे। एक तरफ से आरोप उछाले जाते हैं, तो दूसरी तरफ से राजनयिकों को बोरिया-बिस्तर समेटने का फरमान सुना दिया जाता है। लेकिन जैसे ही 5.5 अरब डॉलर का चेक टेबल पर आया, अचानक दोनों तरफ के कॉर्पोरेट सूरमाओं की बांछें खिल गईं। अब कनाडाई विपक्ष के नेता हैरान हैं कि कल तक जिस भारत को हम संसद में कोस रहे थे, आज उसी का वित्तीय ढांचा हमारे बैंक को निगलने आ गया है?
नेताओं का राष्ट्रवाद और कर्मचारियों का सिरदर्द
अब इस डील का विरोध देखिए। एक तरफ कनाडाई नेता चिल्ला रहे हैं कि “अरे भाई! हमारा राष्ट्रीय स्वाभिमान कहां गया?” (हालांकि स्वाभिमान की कीमत शायद 5.5 अरब डॉलर से थोड़ी कम पड़ गई)। दूसरी तरफ बैंक के कर्मचारी हैं, जिन्हें असली डर सता रहा है। उन्हें लग रहा है कि कहीं इस टेकओवर के बाद उनकी ‘वर्क-लाइफ बैलेंस’ वाली कनाडाई नौकरियां, भारतीय स्टाइल के ’24/7 काम करो’ वाले कल्चर में न बदल जाएं! कर्मचारियों को लग रहा है कि कल तक जो चाय-कॉफी के लंबे ब्रेक मिलते थे, कहीं अब उन्हें टारगेट पूरा करने के लिए रात भर जगना न पड़े।
‘काक-वाणी’ का कड़वा सच
सियासत का पहला नियम है—जनता को दिखाने के लिए सीमा पर तलवारें भांजो, और टेबल के नीचे से चुपचाप डील की फाइल पास कर दो। भारत और कनाडा के इस बैंक टेकओवर ने साबित कर दिया है कि राष्ट्रवाद का गुब्बारा चाहे कितना भी फूला हो, जब 5.5 अरब डॉलर की सुई चुभती है, तो सारी हवा निकल जाती है। ‘काक-वाणी’ तो बस यही कहेगी—साहब, कूटनीति सिर्फ भाषणों के लिए होती है, जब बात धंधे की आती है तो सबसे बड़े विरोधी भी गले मिलकर कहते हैं—’बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपैया (या डॉलर)’!
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