वाह! धन्य हैं वो बुद्धिजीवी जो सात समंदर पार वाशिंगटन के वातानुकूलित कमरों में बैठकर दुनिया की सबसे जटिल समस्याओं का हल ‘इंस्टाग्राम रील्स’ में ढूंढ लेते हैं। हाल ही में प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘द डिप्लोमैट’ में एक अत्यंत ‘क्रांतिकारी’ लेख छपा, जिसका शीर्षक था—”क्या कश्मीर भारत के जेन-जी आंदोलन से सीख सकता है?” सच मानिए, इस बौद्धिक जुगाली को पढ़कर ‘काक-वाणी’ के दफ्तर में कौवे भी हंसते-हंसते अपनी डाल से गिर पड़े।
जब ‘नो कैप’ और ‘एस्थेटिक रील्स’ से सुलझेगा कश्मीर का मुद्दा
अब तक कश्मीर के मसले पर न जाने कितने द्विपक्षीय समझौते, शिमला वार्ताएं और संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव धूल फांक रहे हैं। लेकिन विदेशी विश्लेषकों ने असली चाबी अब जाकर ढूंढी है—’जेन-जी’ यानी वह पीढ़ी जो सुबह उठकर एंग्जायटी का शिकार होती है और शाम तक ट्विटर पर ‘कैंसल कल्चर’ का हथियार चलाती है।
कल्पना कीजिए, कश्मीर के युवा अब कठिन राजनीतिक परिस्थितियों को छोड़कर हाथ में ट्राइपॉड पकड़ेंगे। घाटी में शांति स्थापित करने के लिए सुरक्षा बलों के सामने ‘क्यूट डांस रील्स’ बनाई जाएंगी और बैकग्राउंड में कोई ट्रेंडिंग गाना बजेगा। क्या अद्भुत नजारा होगा! अगर किसी को कोई शिकायत होगी, तो वह पत्थर उठाने के बजाय इंस्टाग्राम पर ‘आई एम ऑफेंडेड’ (I am offended) का स्टेटस लगा देगा।
इंटरनेट शटडाउन बनाम ‘डिजिटल एक्टिविज्म’
लेखक महोदय की मासूमियत तो देखिए! वे कश्मीर के युवाओं को उस ‘जेन-जी’ से सीखने की सलाह दे रहे हैं, जिनका सबसे बड़ा संघर्ष वाई-फाई का धीमा होना या स्टारबक्स की कॉफी में नाम की स्पेलिंग गलत होना है। कश्मीर, जहां सुरक्षा कारणों से अक्सर इंटरनेट की रफ्तार धीमी कर दी जाती है, वहां के युवाओं को ‘डिजिटल एक्टिविज्म’ और हैशटैग चलाने की सीख दी जा रही है। शायद अगली बार जब घाटी में तनाव होगा, तो वहां के लोग सरकार को ‘अनफॉलो’ और ‘ब्लॉक’ करने की धमकी देंगे।
क्या इन महान विचारकों को यह पता भी है कि जमीन पर बंदूक की नली और कड़े कानूनों के सामने ‘वोक’ (Woke) शब्दावली काम नहीं आती? वहां ‘माई प्रोनाउंस’ (My pronouns) बताने से जमीनी हकीकत नहीं बदलती।
काक-वाणी का मुफ्त परामर्श
हम इस लेख के लेखक को धन्यवाद देना चाहते हैं। उनके इस अनोखे विचार के बाद, अब हमें ‘द डिप्लोमैट’ के अगले संस्करणों का बेसब्री से इंतजार है। शायद अगला लेख होगा—”क्या यूक्रेन को रूस से निपटने के लिए टिकटॉक इन्फ्लुएंसर्स से युद्ध नीति सीखनी चाहिए?” या “क्या गाजा के लोग नेटफ्लिक्स देखकर शांति का मार्ग खोज सकते हैं?”
कश्मीर की वादियों में जब तक शांति का कोई ठोस हल नहीं निकलता, तब तक विदेशी लिबरल एक्टिविस्ट ऐसे ही की-बोर्ड पर बैठकर ज्ञान की गंगा बहाते रहेंगे। बिना जमीनी हकीकत जाने इतनी बड़ी बकवास लिखना भी तो एक कला है! ‘नो कैप’ ब्रो, आपकी इस पत्रकारिता को ‘काक-वाणी’ का शत-शत नमन!
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