पूरी दुनिया के भू-राजनीतिक विशेषज्ञ सालों से माथापच्ची कर रहे थे कि कश्मीर की समस्या का समाधान कैसे निकाला जाए। कभी शिमला समझौता, कभी लाहौर घोषणापत्र, तो कभी धारा 370 का खात्मा। लेकिन अफसोस, किसी के पास वो दिव्य दृष्टि नहीं थी जो अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘द डिप्लोमैट’ के पास है। उन्होंने एक बेहद क्रांतिकारी और ज्ञानवर्धक लेख लिखा है, जिसका मूल मंत्र है: “क्या कश्मीर भारत के जेन-जी (Gen Z) आंदोलन से कुछ सीख सकता है?”
वाह! क्या अद्भुत विचार है। ‘काक-वाणी’ इस बौद्धिक जुगाली की भूरि-भूरि प्रशंसा करती है। कश्मीर के युवाओं को अब बंदूक, पत्थर या राजनीतिक स्वायत्तता की मांग छोड़ देनी चाहिए। उन्हें तुरंत दिल्ली और मुंबई के वातानुकूलित कमरों में बैठे डिजिटल युवा मोर्चा के सेनानियों से ट्यूशन लेना चाहिए। आखिर कश्मीरियों ने अब तक ‘इंस्टाग्राम रील्स’ और ‘कैंसिल कल्चर’ का सही इस्तेमाल जो नहीं सीखा!
चिंताओं का समाधान: ‘कैंसिल कल्चर’ और ‘एस्थेटिक’ आंदोलन
कल्पना कीजिए, कश्मीर की वादियों में सेना के बंकरों के सामने कश्मीरी युवा अब पत्थर नहीं, बल्कि आईफोन लेकर खड़े हैं। वे सैनिकों के सामने ‘स्लो-मोशन’ में चलकर रील बना रहे हैं और बैकग्राउंड में कोई उदास सूफी संगीत बज रहा है। सुरक्षाबलों की किसी भी कार्रवाई पर सीधे ट्विटर पर ‘हैशटैग बॉयकोट’ चलाया जा रहा है। अगर वहां इंटरनेट बंद भी हो जाए, तो क्या हुआ? जेन-जी का सबसे बड़ा हथियार है ‘वाइब्स’ (vibes) और ‘एस्थेटिक’ (aesthetic)। जब तक विरोध-प्रदर्शन पेस्टल रंगों वाले पोस्टरों और स्टारबक्स की कॉफी के साथ न हो, तब तक उसमें वो ‘क्रांतिकारी फील’ कैसे आएगा?
अगर कश्मीर के लोग हमारे ‘जेन-जी’ से सीख लें, तो वे समझ जाएंगे कि असल लड़ाई सड़कों पर नहीं, बल्कि इंस्टाग्राम स्टोरी पर ‘माई प्रोनॉन्स आर…’ लिखकर जीती जाती है। वहां के अलगाववादी नेताओं को भी अब भारी-भरकम राजनीतिक भाषणों के बजाय ‘गेट रेडी विद मी’ (GRWM) वीडियो बनाने चाहिए। मान लीजिए, कोई नेता कह रहा है, “आज मैं नजरबंद होने जा रहा हूँ, तो चलिए देखिए मैं कौन सा कुर्ता पहन रहा हूँ।” इससे वैश्विक स्तर पर कितनी सहानुभूति मिलेगी!
‘द डिप्लोमैट’ के इस महान सुझाव के बाद, भारत सरकार को भी अपनी कश्मीर नीति बदल लेनी चाहिए। अब वहां भारी सुरक्षा बल भेजने की कोई जरूरत नहीं है। बस कुछ नामचीन इन्फ्लुएंसर्स को घाटी में भेज दीजिए। वे वहां ‘कश्मीरी कहवा चैलेंज’ और ‘व्लॉगिंग’ के जरिए ऐसा शांति समझौता कराएंगे कि इतिहासकार दंग रह जाएंगे। आखिरकार, जब तक घाटी में ‘पीस’ (Peace) के साथ ‘पिज्जा’ और ‘फॉलोअर्स’ न बढ़ें, तब तक उस आज़ादी का क्या फायदा? धन्य हैं ऐसे विदेशी विचारक और धन्य है उनका यह ज्ञान!
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